भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 639 में से

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ही है। १ रोग इस आरोग्य, अभ्युदय तथा जीवन (आयु) को नाश करने वाले हैं। मनुष्यों के लिए ये रोग बड़े विघ्नरूप हो गये हैं। इसलिए इन रोगों की शान्ति का उपाय क्या होना चाहिए ? ऐसा कहकर वे सब ऋषि ध्यान मग्न हो गये। उन्होंने अन्तश्चक्षु से इन्द्र को अपनेको शरण देने वाले के रूप से देखा और जान लिया कि देवों का राजा इन्द्र ही शान्ति का उपाय कहेगा ॥१६-१७॥ कः सहस्राक्षभवनं गच्छेत्प्रष्टुं शचीपतिम् ॥ १८ ॥ अहमर्थे नियुज्येयमत्रेति प्रथमं वचः । भरद्वाजोऽब्रवीत्तस्मादृषिभिः स नियोजितः ॥ १६ ॥ प्रश्न उपस्थित हुआ कि शचीपति इन्द्र से पूछने के लिये इन्द्र के भवन तक कौन जाय ? ऋषि भरद्वाज ने सबसे प्रथम कहा कि—इस कार्य में मुझको नियुक्त किया जाये। इसलिए आंगरा आदि ऋषियों ने भरद्वाज ऋषि को ही इस कार्य में नियुक्त कर दिया ॥ १८-१६ ॥ स शक्रभवनं गत्वा सुरर्षिगणमध्यगम् । ददर्श बलहन्तारं दीप्यमानमिवानलम् ॥ २० ॥ इन्द्र के भवन में जाकर, उन्होंने देवर्षियों के मध्य में प्रदीप्त अग्नि के समान तेजस्वी, बल नाम असुर को मारने वाले इन्द्र को देखा ॥ २० ॥ सोऽभिगम्य जयाशीर्भिरभिनन्द्य सुरेश्वरम् । प्रोवाच भगवान्धीमानृषीणां वाक्यमुत्तमम् ॥ २१ ॥ बुद्धिमान भरद्वाज ने इन्द्र के सम्मुख जाकर जयसूचक आशीर्वादों से इन्द्र का अभिनन्दन करके, ऋषियों का उत्तम वचन प्रस्तुत किया ॥ २१ ॥ व्याधयो हि समुत्पन्नाः सर्वप्राणिभयंकराः । तद् ब्रूहि मे शमोपायं यथावदमरप्रभो ॥ २२ ॥ हे अमरप्रभो ! सब प्राणियों को भय देने वाली व्याधियां उत्पन्न हो गई हैं इसलिये आप इनकी शान्ति का उपाय उपदेश करें ॥ २२ ॥ तस्मै प्रोवाच भगवान्नायुर्वेदं शतक्रतुः । पदैरल्पैर्मतिं बुद्ध्वा विपुलां परमर्षये ॥ २३ ॥ १ कहा भी है— "आयतनं विद्यानां मूलं धर्मार्थकाममोक्षाणाम् । श्रेयः परं किमन्यत् शरीरमजरामरं विधायैकम् ॥” रसहृदयतंत्र ॥ २ योग्य शिष्य ही विनयपूर्वक गुरु से शास्त्रों को सुनने का अधिकारी है। यथा:—तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ गीता ॥

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