भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० १ ] सूत्रस्थानम् ५ भगवान् इन्द्रने महर्षि भरद्वाज को महामति जान कर थोड़े ही शब्दों में संक्षेप से आयुर्वेद का उपदेश किया ॥ २३ ॥ हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम् । त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः ॥ २४ ॥ सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामतिः । यथावदचिरात् सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ॥ २५ ॥ तेनाऽऽयुरमितं लेभे भरद्वाजः सुखान्वितम् । ऋषिभ्योऽनधिकं तच्च शशंसानवशेषयन् ॥२६॥ ऋषयश्च भरद्वाजाज्जगृहुस्तं प्रजाहितम् । दीर्घमायुश्चिकीर्षन्तो वेदं वर्धनमायुषः ॥ २७ ॥ हेतु ( रोगों का कारण ), लिंग ( रोगों के चिन्ह ), औषध, (संशोधन और संशमन रूप चिकित्सा ), स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिए परम गति और जिस का पितामह ( ब्रह्मा ) ने प्रथम ज्ञान किया था, उस तीन सूत्र १ वाले पुण्य, श्रेष्ठ और नित्य, सनातन २ आयुर्वेद का इन्द्र ने उपदेश किया । महामति भर- द्वाज मुनि ने एकाग्रचित्त होकर इस अनन्त और अपार ३ और तीन स्कन्धों वाले आयुर्वेद को यथावत् शीघ्र ही सम्पूर्ण जान लिया । भरद्वाज मुनि ने इस १ त्रिःसूत्र—हेतु, दोष और द्रव्य संग्रह रूप: हेतुसंग्रह—कालबुद्धीन्द्रियार्थानां योगो मिथ्या न चाति च । द्वयाश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसंग्रहः ॥ दोषसंग्रह—वातः पित्तं कफश्चोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः । मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥ द्रव्यसंग्रह—किंचिद्दोषप्रशमनं किंचिद् धातु-प्रदूषणम् । स्वस्थवृत्तौ मतं किंचित् त्रिविधं द्रव्यमुच्यते ॥ अथवा 'त्रिसूत्र' शब्द से वात, पित्त और कफ का ग्रहण करना चाहिये । क्योंकि सम्पूर्ण आयुर्वेद शास्त्र इन्हीं में ओत-प्रोत है । जैसा कि सुश्रुत में— “वातपित्तश्लेष्माण एव देहसंभवहेतवः । तैरेवाव्यापन्नैरधो मध्योर्ध्वसंनिविष्टैः शरीरारमदं धार्यत-आगारमिव स्थूणाभिः । अतः त्रिस्थूणाभिरित्येके ।” २—सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वात् । चरक ॥ ३- नास्ति आयुर्वेदस्य पारम्, तस्मादप्रमत्तः शश्वदभियोगमस्मिन् गच्छेत् । ॥ चरक ॥

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