चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें२१४ चरकसंहिता [ अ० १७ गुरु-स्निग्धाम्ल-लवणं भजतामतिमात्रशः । नवमन्नं च पानं च निद्रामास्यासुखानि च ॥ ७७ ॥ त्यक्तव्यायाम-चिन्तानां संशोधनमकूर्वताम् । श्लेष्मा पित्तं च मेदश्च मांसं चातिप्रवर्धते ॥ ७८ ॥ तैरावृतगतिर्वायुरोज आदाय गच्छति । यदा बस्तिं तदा कृच्छ्रो मधुमेहः प्रवर्तते ॥ ७६ ॥ समारुतस्य पित्तस्य कफस्य च मुहुर्मुहुः । दर्शयत्याकृतिं गत्वा क्षयमप्याय्यते पुनः ॥ ८० ॥ उपेक्ष्याऽस्य जायन्ते पिडकाः सप्त दारुणाः । मांसलेष्ववकाशेषु मर्मस्वपि च सन्धिषु ॥ ८१ ॥ मधुमेह का कारण- अति मात्रा में गुरु, स्निग्ध, खट्टे या नमकीन पदार्थों के खाने से, नवीन (नवीन ऋतु के चावल-गेहूँ आदि) अन्न या नया पानी (बरसात का पानी, कूर्ओ या नदी से पीने पर) अधिक सोने से, ऐश आरामतलबी का जीवन बिताने से, व्यायाम और चिन्ता न करने से, वमन विरेचन कर्मों के न करने से, कफ, पित्त, मेद और मांस बहुत बढ़ जाते हैं। इनके बढ़ने से मार्गों के रुक जाने से वायु आज धातु को लेकर मूत्राशय (मूत्रसंस्थान) में चली जाती है। तब कष्ट साध्य 'मधुमेह' रोग उत्पन्न होता है। बढ़े हुए वात, पित्त, कफ के लक्षण प्रथम प्रकट होते हैं। कुछ समय पीछे इन्हीं दोषों की क्षीणता (क्षय) के लक्षण दीखने लगते हैं, और फिर बढ़े हुए दोषों के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इस समय उपेक्षा करने से सात भयानक पिड़कायें अधिक मांस से युक्त स्थानों में, मर्मस्थानों में और सन्धियों में उत्पन्न हो जाती हैं ॥ ७५-८१ ॥ शराविका कच्छपिका जालिनी सर्षपी तथा । अलजी विनताख्या च विद्रधी चेति सप्तमी ॥ ८२ ॥ अन्तोन्नता मध्यनिम्ना श्यावा क्लेदरुजान्विता । शराविका स्यात्पिडका शरावाकृतिसंस्थिता ॥ ८३ ॥ अवगाढार्ति-निस्तोदा महावास्तु-परिग्रहा । श्लक्ष्णा कच्छपपृष्ठाभा पिडका कच्छपी मता ॥ ८४ ॥ स्तब्धा शिराजालवती स्निग्धश्रावा महाशया । रुजा-निस्तोद-बहुला सूक्ष्मच्छिद्रा च जालिनी ॥ ८५ ॥ पिडका नातिमहती क्षिप्रपाका महारुजा ।