चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १७] सूत्रस्थानम् २१५ सर्पपी सर्पपाभाभिः पिडकाभिश्चिता भवेत् ॥ ८६ ॥ दहति त्वचमुत्थाने तृष्णा-मोह-ज्वर-प्रदा । विसर्पत्यनिशं दुःखाहत्यग्निरिवाऽलजी ॥ ८७ ॥ अवगाढ-रुजा-क्लेदा पृष्ठे वाऽप्युदरेऽपि वा । महती विनता नीला पिडका विनता मता ॥ ८८ ॥ सात पिड़कायें—शराविका, कच्छपिका, जालिनी, सर्पपी, अलजी, विनता और विद्रधि ये सात प्रकार की पिड़कायें उत्पन्न होती हैं। किनारों से ऊँची और बीच से दबी, श्याव अर्थात् ऊदे रंग की, स्रावयुक्त और पीड़ायुक्त, यह पिड़का शराव (परई, सकोरा के ) के आकार की होती है, इसे शराविका कहते हैं। जो गम्भीर वेदना वाली दर्दयुक्त, महावस्तु का आश्रय करके रहती है [बहुत अधिक स्थान घेरा हो] ऊपर से चिकनी और कछुवे की पीठ के समान ऊपर से उठी पिड़का 'कच्छपी' होती है। जड़ (न हिलने वाली), शिराओं के जालयुक्त, चिकने स्रावयुक्त, बड़े आशय में आश्रित, दर्द और चुभने की सी वेदनायुक्त तथा छोटे-छोटे छेदों से घिरी पिड़का 'जालिनी' होती है। बहुत बड़ी नहीं, जल्दी पकने वाली, बहुत वेदना युक्त, सरसों के आकार की छोटी-छोटी पिड़काओं से घिरी पिड़का 'सर्पपी' है। अलजी पिड़का के उत्पन्न होने पर त्वचा जलने लगती है, तृष्णा, मूर्च्छा, ज्वर होता है। रात दिन दुःखी करती है, अग्नि के समान दुःख से रोगी जलता है, इसका नाम 'अलजी' है। जिस में स्राव बहुत गाढ़ा हो, बहुत सख्त वेदना हो, स्राव हो, पिड़का पीठ या उदर में हो, बहुत बड़ी, दबी हुई सी, नीले रंग की पिडका को 'विनता' कहते हैं ॥ ८२-८८ ॥ विद्रधिं द्विविधामाहुर्बाह्यामाभ्यन्तरीं तथा । बाह्या त्वक्स्नायु-मांसोत्था कण्डराभा महारुजा ॥ ८९ ॥ शीतकाम्लविदाह्युष्ण-रूक्ष-शुष्कातिभोजनात् । विरुद्धाजीर्ण-संक्लिष्ट-विषमासात्म्य-भोजनात् ॥ ९० ॥ व्यापन्न-बहु-मद्यत्वाद्द्वेगसंधारणाच्छ्रमात् । जिह्म-व्यायाम-शयनादतिभाराध्वमैथुनात् ॥ ९१ ॥ अन्तःशरीरे मांसासृगाविशन्ति यदा मलाः । तदा संजायते ग्रन्थिर्गम्भीरस्थः सुदारुणः ॥ ९२ ॥ हृदये क्लोम्नि यकृति प्लीह्नि कुक्षौ च वृक्कयोः । नाभ्यां वङ्क्षणयोर्वापि बस्तौ वा तीव्रवेदनः ॥ ९३ ॥