चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 268, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें[Page Header: २५० चरकसंहिता [ अ० २१ ]
भली प्रकार सहन करले, न कम और न अधिक, भोजन को जीर्ण करने वाला हो, जिसको बुढापा ठीक समीप पर आये, वह पुरुष समान उपचय अर्थात् उचित शरीर की बनावट का होता है ॥ १८-१९ ॥ गुरु चातर्पणं चेष्टं स्थूलानां कर्षणं प्रति । कृशानां बृंहणार्थं च लघु संतर्पणं च यत् ॥ २० ॥ वातघ्नान्यन्नपानानि श्लेष्म-मेदो-हराणि च । रूक्षोष्णा बस्तयस्तीक्ष्णा रूक्षाण्युद्वर्तनानि च ॥ २१ ॥ गुडूची-भद्र-मुस्तानां प्रयोगस्त्रैफलस्तथा । तक्रारिष्टप्रयोगस्तु प्रयोगो माक्षिकस्य च ॥ २२ ॥ विडङ्गानागरं क्षारः काल-लोह-रजो मधु । यवामलकचूर्णं च प्रयोगः श्रेष्ठ उच्यते ॥ २३ ॥ बिल्वादिपञ्चमूलस्य प्रयोगः क्षौद्रसंयुतः । शिलाजतुप्रयोगस्तु साग्निमन्थरसः परः ॥ २४ ॥ प्रशातिका प्रियङ्गुश्च श्यामाका यवका यवाः । जूर्णाह्वाः कोद्रवा मुद्गाः कुलत्थाश्चक्रमूद्रकाः ॥ २५ ॥ आढकीनां च बीजानि पटोलामलकैः सह । भोजनार्थं प्रयोज्यानि पानं चानु मधूदकम् ॥ २६ ॥ अरिष्टांश्चानुपानार्थे मेदो-मांस-कफापहान् । अतिस्थौल्यविनाशाय संविभज्य प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥ प्रजागरं व्यवायं च व्यायामं चिन्तनानि च । स्थौल्यमिच्छन् परित्यक्तुं क्रमेणाभिप्रवर्धयेत् ॥ २८ ॥ स्थूल पुरुषों को कृश बनाने के लिये गुरु (भारी) और अपतर्पण क्रिया (यथा शहद भारी होने से अग्नि को कम करता है और अपतर्पण होने से मेद को कम करता है) उचित है। कृश पुरुषों को मोटा करने के लिये लघु एवं सन्तर्पण क्रिया करनी चाहिये । अतिस्थूल की चिकित्सा — वातनाशक खान पान, कफ और मेदनाशक आहार, रूखी एवं गरम बस्तियां, तीक्ष्ण, रूक्ष उबटन का मलना, गिलोय, नागर मोथा, इनका, या त्रिफला का क्वाथ देना, तक्रारिष्ट का प्रयोग अथवा मधु का उपयोग, बायबिडंग, सोंठ, क्षार, कान्त लोह-भस्म को शहद के साथ, जौ और आंवले का चूर्ण, इनका प्रयोग उत्तम है। बिल्व, अरणी, सोना पाठ, काश्मरी, पाटना इनके क्वाथ में मधु प्रक्षेप करके पीना, अग्निमन्थ (अरणी) के रस के साथ शिलाजीत