भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 289

अ० २४ ] सूत्रस्थानम् २७१ स्रोतों को रोक लेते हैं, तब निम्न लिखित रोग उत्पन्न होते हैं । यथा—मद, मूर्च्छा और संन्यास ये रोग होते हैं । इन तीनों दोषों के हेतु, लिङ्ग ( लक्षण ) और शान्ति, उपचार में उत्तरोत्तर बल की अधिकता रहती है । अर्थात् मद से अधिक मूर्च्छा में और मूर्च्छा से अधिक संन्यास में बल की अधिकता रहती है। जिस समय चेतना का स्थान हृदय निर्बल हो जाता है और यहां पर वायु का प्रकोप हो, तब वह मन को क्षोभित करके मनुष्य की संज्ञा ( चेतना ) को ढांप लेता है, पित्त और कफ ही मन का विक्षोभ उत्पन्न करके संज्ञा का नाश करते हैं । विशेष रूप से पृथक् पृथक् कहते हैं रुक-रुक कर (तुतलाकर) बोलना, बहुत बोलना, जल्दी-जल्दी बोलना, चलते हुये लड़खड़ा करके गिरते-पड़ते चलना, चेहरे का रंग रूखा, काला, लाल सा होना, वातजन्य मद के लक्षण हैं। क्रोधयुक्त कठोर 'गाली) वाणी बोलना, चोट या आघात करना, झगड़ा करना, चेहरे का रंग लाल, पीला या काला होना, पित्तजन्य मद के लक्षण हैं । थोड़ा परन्तु सम्बन्ध (पूर्वापर सम्बन्ध ) युक्त बोलना, तन्द्रा और आलस्य का होना, चेहरे का रंग धूसरवर्ण, एक ध्यान में मग्न होना ये कफजन्य मद के लक्षण हैं। सन्निपातजन्य मद में सब दोषों के लक्षण मिलते हैं । मद्यजन्य मद में आकृति शराबी पुरुष के समान होती है और यह मद जल्दी चढ़ता है और जल्दी उतर जाता है । मद्यजन्य, विषजन्य, रक्तजन्य और दोषजन्य ये चारों प्रकार के मद, वात, पित्त, कफ को छोड़कर नहीं होते हैं ॥ २६-३४ ॥ नीलं वा यदि वा कृष्णमाकाशमथवाऽरुणम् । पश्यंस्तमः प्रविशति शीघ्रं च प्रतिबुध्यते ॥ ३५ ॥ वेपथुश्चाङ्गमर्दश्च प्रपीडा हृदयस्य च । काश्यं श्यावाऽरुणा छाया मूर्च्छा ये वातसंभवे ॥ ३६ ॥ रक्तं हरितवर्णं वा वियत्पीतमथापि वा । पश्यंस्तमः प्रविशति सस्वेदश्च प्रबुध्यते ॥ ३७ ॥ सपिपासः ससन्तापो रक्तपीताकुलेक्षणः । संभिन्नवर्चाः पीताभो मूर्च्छाये पित्तसंभवे ॥ ३८ ॥ मेघसंकाशमाकाशमावृतं वा तमोधनैः । पश्यंस्तमः प्रविशति चिराच्च प्रतिबुध्यते ॥ ३६ ॥ गुरुभिः प्रावृतैरङ्गैर्यथैवाऽऽर्द्वेण चर्मणा । सप्रसेकः सहृल्लासो मूर्च्छा ये कफसंभवे ॥ ४० ॥ सर्वाकृतिः सन्निपातादपस्मार इवाऽऽगतः ।