चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 290, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें२७२ चरकसंहिता [ अ० २४ स जन्तुं पातयत्याशु विना बीभत्सचेष्टितैः ॥ ४१ ॥ दोषेषु मदमूर्छायाः कृतवेगेषु देहिनाम् । स्वयमेवोपशाम्यन्ति संन्यासो नौषधैर्विना ॥ ४२ ॥ वाग्देहमनसां चेष्टामाक्षिप्यातिबला मलाः । संन्यस्यन्त्यबलं जन्तुं प्राणायतनसंश्रिताः ॥ ४३ ॥ स ना संन्याससंन्यस्तः काष्ठीभूतो मृतोपमः । प्राणैर्वियुज्यते शीघ्रं मुक्त्वा सद्यःफलां क्रियाम् ॥ ४४ ॥ मूर्छा के लक्षण—आंखों के सामने आकाश नीला या काला अथवा लाल दीखता है, आंखों के सामने अन्धेरा आ जाता हो और मनुष्य मूर्छा से जल्दी ही सचेत हो जाय, शरीर में कम्पन और अंगों में पीड़ा हो, हृदय में वेदना का अनुभव हो, कृशता और छाया, मुख का वर्ण काला या लाल हो जाय, ये वातजन्य मूर्छा के लक्षण हैं । आकाश लाल पीला या हरा दिखाई दे, अन्ध- कार आता दिखाई दे और उठते समय शरीर पर पसीना, प्यास वा जलन हो, आंखें लाल या. पीली, व्याकुल दीखती हों, मल पतला (अतीसार), चेहरे का रंग पीला पड़ जाता है, ये पित्तजन्य मूर्च्छा के लक्षण हैं। आकाश बादलों से घिरा या अन्धकार से आवृत दिखाई दे, अन्धकार सामने आता दिखाई दे, मूर्च्छा से देर में जागृत हो, भारी तथा गीले कपड़े में शरीर ढपा प्रतीत होता हो, (शरीर जकड़ा एवं भारी), मुख से लार बहना, बेचैनी, ये कफजन्य मूर्च्छा के लक्षण हैं । सन्निपात से सब दोषों के लक्षण होते हैं, अपस्मार के समान इसमें वेग आता है। इस रोग में बीभत्स चेष्टाओं (दांतों से काटना, हाथ पांव आदि फेंकने) के बिना मनुष्य गिर पड़ता है। शरीरधारियों में जब मद- मूर्च्छा को उत्पन्न करने वाले दोषों का बल कम हो जाता है, तब ये रोग अपने आप शान्त हो जाते हैं, परन्तु 'संन्यास' रोग विना औषध के अच्छा नहीं होता । अति बलवान् मल वातादि दोष, प्राणायतन (हृदय आदि) अवयवों का आश्रय करके, वाणी, शरीर और मन की क्रियाओं को एकदम से बन्द कर देते हैं, तब मनुष्य निर्बल, निष्क्रिय, क्रियारहित, लकड़ी के समान निर्जीव होकर गिर पड़ता है । इस समय यदि तात्कालिक फल देने वाली क्रियायें ( अंजन, नस्य आदि ) जल्दी न की जायें तो मनुष्य मर जाता है ॥ ३५-४४ ॥ दुर्गेऽम्भसि यथा मज्जद्राजनं त्वरया बुधः । गृह्णीयात्तलमप्राप्तं तथा संन्यासपीडितम् ॥ ४५ ॥ अञ्जनान्यवपीडांश्च धूमः प्रधमनानि च ।