चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ] सूत्रस्थानम् १३ इस प्रकार सामान्य आदि छः कारणों का वर्णन किया गया है। अब उनका कार्य कहा जाता है। इस शास्त्र में 'धातुओं का साम्य करना' ही कार्य्य है [ घट-पट आदि कार्य नहीं है ]। इस शास्त्र का—प्रयोजन भी धातुओं को समान रखना ही है। क्षीण हुए धातु बढ़ाने चाहिये, बढ़े हुए घटाने चाहिये और समान का रक्षण करना चाहिये। जैसा कि आगे कहेंगे— 'प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं, आतुरस्य विकारप्रशमनञ्च' ॥५३॥ धातुओं के विषम होने का कारण - कालबुद्धीन्द्रियार्थानां योगो मिथ्या न चाति च । द्वयाश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसंग्रहः ॥ ५४ ॥ काल [ शीत-वर्षा ग्रीष्म रूपी संवत्सर अथवा परिणाम ], बुद्धि, और इन्द्रि- यार्थ [ इन्द्रियों के विषय शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ] इन तीन के अतियोग, अयोग और मिथ्यायोग होने से दोनों प्रकार की शारीरिक और मान- सिक व्याधियां उत्पन्न होती हैं ॥ ५४ ॥ शरीरं सत्त्वसंज्ञं च व्याधीनामाश्रयो मतः । तथा सुखानां योगस्तु सुखानां कारणं समः ॥ ५५ ॥ शरीर और सत्त्व ( मन ) ये दोनों ही [ पृथक् रूप से एवं सम्मिलित रूप में ] रोगों की अधिष्ठान भूमि हैं । और जिस प्रकार ये दोनों व्याधियों का आश्रय स्थान हैं, इसी प्रकार सुख का भी आश्रय स्थान यही हैं। सुख का कारण - काल, बुद्धि और इन्द्रियों के विषयों का, सम [ उचित रूप में ] योग होना ही आरोग्य का कारण है। कहा भी है— “सुखहेतुर्मतस्त्वेकः समयोगः सुदुर्लभः” ॥ ५५ ॥ आत्मा का स्वरूप कहते हैं— निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्त्वभूतगुणेन्द्रियैः । चैतन्ये कारणं नित्यो द्रष्टा पश्यति हि क्रियाः ॥ ५६ ॥ १. “त्रीण्यायतनानीत्यर्थानां, कर्मणः कालस्य चातियोगायोगमिथ्यायोगाः । असात्म्येन्द्रियार्थसंयोगः प्रज्ञापराधः परिणामश्चेति त्रयस्त्रिविधविकल्पा हेतवो विकारकारणम्” ॥ “समयोगयुक्तास्तु प्रकृतिहेतवो भवन्ति” । च० ॥ २. वेदनानामधिष्ठानं मनो देहश्च सेन्द्रियः । केशलोमनखाग्रान्तमलद्रवगुणैर्विना ॥ चरक ॥