चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 32, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें१४ चरकसंहिता [ अ० १ निर्विकार१ और सूक्ष्म आत्मा, मन, शब्दादिगुण, इन्द्रियों द्वारा चैतन्य में कारण हैं, वह नित्य है, साक्षी है, क्योंकि वह सब क्रियाओं को देखता है । अचेतन शरीर और मनके चैतन्य में यह आत्मा ही कारण है; और वह नित्य है ! रोग प्रकृति— वायुः पित्तं कफश्चोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः । मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥ ५७ ॥ संक्षेप रूप में शारीरिक दोषों के कारण वात, पित्त और कफ हैं । और मानसिक दोषों के कारण रज और तम हैं२ । शारीरिक कोई भी रोग इन वात, पित्त, कफ के बिना नहीं हो सकता ॥ ५७ ॥ इनका प्रतीकार — प्रशाम्यत्यौषधैः पूर्वो दैवयुक्तिव्यपाश्रयैः । मानसो ज्ञानविज्ञानधैर्यस्मृतिसमाधिभिः ॥ ५८॥ शारीरिक दोष दैव व्यपाश्रय और युक्ति-व्यपाश्रय औषधियों से शान्त हो जाते हैं । मानसिक दोष ज्ञान ( आत्मा आदि के ), विज्ञान अर्थात् शास्त्र ज्ञान, (धैर्य) चित्त की स्थिरता, (स्मृति) अनुभूत पदार्थ का स्मरण, (समाधि) विषयों से मन को हटा कर आत्मा में लगाना इनसे शान्त हो जाते हैं । दैव-व्यपाश्रय—मणि, मन्त्र, ओषधि, बलि, उपहार, होम, नियम प्रायश्चित्त आदि कर्म जो कि दैव को आश्रय कर किये जाते हैं । युक्ति-व्यपाश्रय अर्थात् योजना, युक्ति को आश्रय कर किये गये संशो- धन, संशमन आदि कर्म ॥ ५८ ॥ वायु का लक्षण— रूक्षः शीतो लघुः सूक्ष्मश्चलोऽथ विशदः खरः । विपरीतगुणैर्द्रव्यैर्मारुतः संप्रशाम्यति ॥ ५६ ॥ वायु-रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल अर्थात् गतिशील, विशद अर्थात् अवि- १. स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ॥ श्रुतिः । २ वायु को प्रथम लिखा है, क्योकि वात जन्य रोग ही सब से अधिक हैं, 'अशीतिर्वात-विकाराः' एवं 'वायुरेव भगवान्' वायु सबसे प्रबल है । सर्वेषाञ्च व्याधीनां वातपित्तश्लेष्माण एव मूलं तल्लिङ्गत्वत् दृष्टफलवादा- गमाच्च । यथा हि कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितं सत्त्वरजस्तमांसि न व्यतिरिच्यते । एवमेव कृत्स्नं विकारजातं विश्वरूपेणावस्थितमव्यतिरिच्य वात- पित्तश्लेष्माणो वर्तन्ते ॥ सुश्रुत० ॥