चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १ सूत्रस्थानम् १५ च्छिल और खर (कठोर) है । वह इन से विपरीत गुण वाले स्निग्ध, उष्ण गुरु, स्थूल, स्थिर, पिच्छिल और मृदु द्रव्यों से शान्त होता है । शीत से वायु बढ़ता है और उष्णता से कम होता है, इसलिये वायु को वैद्यक शास्त्र में शीत-प्रकृति माना है । वैशेषिक दर्शन में इस को अनुष्णाशीत कहा है—'अनुष्णाशीतः स्पर्शस्तु पवने मतः' ॥ वै० ॥ ५६ ॥ पित्त का लक्षण— सस्नेहमुष्णं तीक्ष्णं च द्रवमम्लं सरं कटु । विपरीतगुणैः पित्तं द्रव्यैराशु प्रशाम्यति ॥ ६० ॥ स्नेहसहित अर्थात् थोड़ा स्निग्ध, उष्ण (गरम), तीक्ष्ण [ शीघ्र कार्य करने वाला, सूई की तरह तेज ], द्रव, अम्ल ( खट्टा ), सर ( गमनशील ), और कटु रस है । पित्त विपरीत गुण वाले द्रव्यों से शीघ्र ही शान्त हो जाता है ॥६०॥ कफ का लक्षण— गुरुशीतमृदुस्निग्धमधुरस्थिरपिच्छिलाः । श्लेष्मणः प्रशमं यान्ति विपरीतगुणैर्गुणाः ॥ ६१ ॥ गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर, स्थिर, और पिच्छिल ये कफ के गुण हैं । इन से विपरीत गुण वाले पदार्थों से ये गुण शान्त होते हैं । [ इन गुणों के शान्त होने से गुणी कफ भी शान्त हो जाता है ] ॥ ६१ ॥ साध्य रोगों की शान्ति— विपरीतगुणैर्देशमात्राकालोपपादितैः । भेषजैर्विनिवर्त्तन्ते विकाराः साध्यसंमताः ॥ ६२ ॥ साधनं न त्वसाध्यानां व्याधीनामुपदिश्यते । भूयश्चातो यथाद्रव्यं गुणकर्म प्रवक्ष्यते ॥ ६३ ॥ विपरीत गुण वाले [ हेतु-विपरीत, व्याधि-विपरीत और हेतु और व्याधि दोनों के विपरीत और कार्य करनेवाले ] द्रव्यों की देश-मात्रा, काल के अनुसार योजना करने पर औषध से साध्य व्याधियां शान्त हो जाती हैं, असाध्य रोग अच्छे नहीं होते । और जो रोग औषधियों से असाध्य हैं उन के लिए औषध का उपदेश भी नहीं किया जाता । इसके आगे फिर विस्तार से एक-एक द्रव्य के गुण कर्म को आचार्य कहेंगे ॥ ६२-६३ ॥ रसों की उत्पत्ति— रसनार्थो रसस्तस्य द्रव्यमापः क्षितिस्तथा । निर्वृत्तौ च, विशेषे च प्रत्ययाः खादयस्त्रयः ॥ ६४ ॥