चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४७ अन्न के दुर्गन्ध को नष्ट करती है। अजवायन, अर्जक ( अजपका ), शोभा- ञ्जन, शालेयमुष्टक और राई ये हृदय को प्रिय और स्वादिष्ठ तथा पित्तवर्धक हैं। गण्डीर ( लाल और श्वेत भेद से दो प्रकार का है, यहां पर लाल का ग्रहण है और श्वेत को शाकवर्ग में कह दिया है ), जल पिप्पली, तुम्बरु, गोजिह्वा ( गाज़बां ) ये तीक्ष्ण, उष्ण, कटु, रूक्ष, कफ-वायुनाशक हैं। भूस्तृण ( गन्ध- तृण ), पुरुषत्वनाशक, कटु, रूक्ष, उष्ण और मुख का शोषक है। खराश्वा ( कालाजीरा ) कफ-वातनाशक, बस्तिरोग और बस्तिशूलनाशक है। धनिया, अजवायन, सुमुखा ( तुलसी भेद ), रोचक, सुगन्धि बहुत कटु नहीं और दोषों को उत्तेजित करते हैं। गाजर ( गृञ्जन ) या शलजम संग्राही, तीक्ष्ण, वात-कफ अर्श रोग में हितकारी, स्वेदन कार्य में हितकारी है, इसका उपयोग पित्त जहां न बढ़ा हो वहां पर करना चाहिये। पलाण्डु ( प्याज़ ) कफकारक, वायुनाशक है, परन्तु पित्त नाशक नहीं है, भोजन में उपयोगी, बलकारक, गुरु, वृष्य और रुचिकर है। लहसुन कृमि, कुष्ठ, किलास रोग- नाशक, वायुनाशक, गुल्मनाशक, स्निग्ध और उष्ण, वीर्यवर्धक, कटु, और गुरु है। ये सब सूखे होने पर तथा इनके फल कफ-वायु नाशक हैं। यह छठा हरितवर्ग समाप्त हुआ। हरितवर्ग की वस्तुवें प्रायः हरी कच्ची ही बरती जाती हैं; इस लिये इसे हरितवर्ग कहते हैं-जैसे आजकल सलाद, प्याज टमाटर कच्चे खाने का रिवाज़ है ॥ १६४-१७५ ॥ इति हरितवर्गः। अथ मद्यवर्गः। प्रकृत्या मद्यमम्लोष्णमम्लं चोक्तं विपाकतः। सर्वं सामान्यतस्तस्य विशेष उपदेक्ष्यते ॥ १७६ ॥ कृशानां सक्तमूत्राणां ग्रहण्यर्शोविकारिणाम्। सुरा प्रशस्ता वातघ्नी स्तन्यरक्तक्षयेषु च ॥ १७७ ॥ हिक्का-श्वास-प्रतिश्याय-कास-वर्चो-प्रहारुचौ। वम्यानाहविबन्धेषु वातघ्नी मदिरा हिता ॥ १७८ ॥ शूल-प्रवाहिकाटोप-कफ-वातार्शसां हितः। जगलो ग्राहिरूक्षोष्णः शोफघ्नो भुक्तपाचनः ॥ १७९ ॥ शोफार्शो-ग्रहणीदोष-पाण्डुरोगाकबिज्वरान्। हन्त्यरिष्टः कफकृतान् रोगान् रोचनदीपनः ॥ १८० ॥