चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १ ] सूत्रस्थानम् १६ १ हस्तीदन्ती ( चका ), २ हैमवती ( श्वेत बच ), ३ श्यामा (त्रिवृत), ४ त्रिवृत् ( लाल जड़ वाली निशोथ ), ५ अधोगुडा ( विधारा ), ६ सप्तला ( शिका काई ), ७ श्वेतनाम ( श्वेत कोयल ), ८ प्रत्यक् श्रेणी ( दन्ती जमाल- गोटा ), ९ गवाक्षी ( इन्द्रायण ), १० ज्योतिष्मती ( माल कंगनी ), ११ बिम्बी (कन्दूरी ), १२ शणपुष्पी (झन झनियां), १३ विषाणिका ( उत्तरण ), १४ अजगन्धा ( डूंकू ), १५ द्रवन्ती ( जंगली एरण्ड ), १६ क्षीरिणी ( दिखौ ) ये सोलह हैं ॥ ७७-७८ ॥ इनके कर्म— शणपुष्पी च बिम्बी च छर्दने हैमवत्यपि । श्वेता ज्योतिष्मती चैव योज्या शीर्षविरेचने ॥ ७६ ॥ एकादशावशिष्टा याः प्रयोक्तव्यास्ता विरेचने । इत्युक्ता नामकर्मभ्यां मूलिन्यः, फलिनीः शृणु ॥ ८० ॥ ऊपर कही हुई सोलह मूलिनी औषधियों में, शणपुष्पी, बिम्बी, और हैम- वती ( श्वेतवचा ) ये तीन वमन कार्य में प्रयोग करनी चाहिये, श्वेत अपराजि- ता, ज्योतिष्मती ये दोनों शिरोविरेचन में, और शेष ग्यारह वनस्पतियां विरेचन कार्य में प्रयोग करना चाहिये । सब कामों में इनके मूल ही काम में लाने चाहिये। इस प्रकार से ये सोलह 'मूलवाली, वनस्पतियां नाम और कर्म सहित कह दी गयी हैं । 'फलिनी' वनस्पतियों का नाम सुनो ॥ ७६-८० ॥ शङ्खिन्यथ विडङ्गानि त्रपुषं मदनानि च । आनूपं स्थलजं चैव क्लीतकं द्विविधं स्मृतम् ॥ ८१ ॥ धामार्गवमथेक्ष्वाकु जीमूतं कृतवेधनम् । प्रकीर्या चोदकीर्या च प्रत्यक्पुष्पा तथाऽभया । अन्तः कोटरपुष्पी च हस्तिपर्ण्याश्च शारदम् ॥ ८२ ॥ कम्पिल्लकारग्वधयोः फलं यत्कुटजस्य च । धामार्गवमथेक्ष्वाकु जीमूतं कृतवेधनम् ॥ ८३ ॥ शंखिनी, विडङ्ग ( बायविडंग ), त्रपुष ( खीरा, ककड़ी ) मदन ( मैन- फल ), आनूप क्लीतक ( जल में पैदा होने वाली मुलहैटी ), स्थलज क्लीतक ( शुष्क भूमि में पैदा होने वाली मुलहैटी ), धामार्गव ( बड़ी तुरई ) इक्ष्वाकु ( कड़वी तुरई ), जीमूत ( वन्दाल ), कृतवेधन ( तुरई ), कडुवी प्रकीर्या और उदकीर्या ( दो प्रकार के करंज ), प्रत्यक् पुष्पा ( अपामार्ग ), अभया ( हरड़ ), अन्तःकोटरपुष्पी ( घाव पत्ता ), शारदा हस्तिपर्णी । ( हस्तिपर्णी के