चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२० चरकसंहिता [ अ० १ शरद् ऋतु में उत्पन्न फल ), कम्पिल्लक (कमीला), आरग्वध (अमलतास), कुटज ( कूड़े का फल, इन्द्र जौ ), ये १६ 'फलिनी' वनस्पतियां हैं ॥ ८१-८३ ॥ इनके कर्म— मदनं कुटजं चैव त्रपुषं हस्तिपर्णिनी । एतानि वमने चैव योज्यान्यास्थापनेषु च ॥ ८४ ॥ नस्तः प्रच्छर्दने चैव प्रत्यक्पुष्पा विधीयते । दश यान्यवशिष्टानि तान्युक्तानि विरेचने ॥ ८५ ॥ धामार्गव, इक्ष्वाकु, जीमूत, अमलतास, मैनफल, कूड़े का फल, खीरा, और हस्तिपर्णी के शरद् ऋतु में उत्पन्न फल ये आठ वनस्पतियां वमन, आस्थापन और निरूह बस्ति कर्म में प्रयोग करना चाहिये । अपामार्ग (चिरचिटे) का फल नस्य कर्म में प्रयोग करना चाहिये । और शेष दस वनस्पतियों का प्रयोग विरेचन कार्य में करना चाहिये । इस प्रकार से ये १६ 'फलिनी' वनस्पतियां नाम और कर्मों द्वारा कह दी हैं ॥ ८४-८५ ॥ चार प्रकार के स्नेह— नामकर्मभिरुक्तानि फलान्येकान्नविंशतिः । सर्पिस्तैलं वसा मज्जा स्नेहो दृष्टश्चतुर्विधः ॥ ८६ ॥ सर्पि ( घी ), तैल, वसा ( चर्बी ) और मज्जा ( अस्थि वा गुठलियों के भीतरी भाग का स्नेह, चिकनाई ) ये चार कहे हैं ॥ ८६ ॥ इनके कर्म कहते हैं:— पानाभ्यञ्जनबस्त्यर्थं नस्यार्थं चैव यौगिकः । स्नेहना जीवना बल्या वर्णोपचयवर्धनाः ॥ ८७ ॥ स्नेहा होते च विहिता वातपित्तकफापहाः । ये चारों स्नेह (पान) शरीर में मुख मार्ग से देने, शरीर पर मालिश करने, (बस्ती) गुदा या उपस्थमार्ग से देने, और (नस्य) नाक से देने में प्रयुक्त होते हैं। ये स्नेह शरीर का स्नेहन करते हैं, शरीर को जीवन देते हैं, शरीर का तर्पण करते हैं, बल और शक्ति को बढ़ाते हैं । ये स्नेह वात, पित्त और कफ को नष्ट करते हैं ॥ ८७ ॥ लवण— सौवर्चलं सैन्धवं च बिडमौद्भिदमेव च ॥ ८८ ॥ सामुद्रेण सहैतानि पञ्च स्युर्लवणानि च । पांच प्रकार के नमक हैं। (१) सैन्धव (सेन्धा नमक) सब नमकों में श्रेष्ठ