चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २७ ] २३ सूत्रस्थानम् ३५३ कूंवा, तड़ाग, चश्मा, सरोवर, झरना आदि का पानी अनूप, पर्वत, और धन्वन् अर्थात् जांगल देश के गुण-दोषों के अनुसार समझना चाहिये १। जो पानी पिच्छिल (चिकास), क्रिमियुक्त क्लिन्न, पत्ते, सरवाळ अथवा कीचड़ से मिला, जिस पानी का रंग बदल गया हो, रस बिगड़ गया हो, सान्द्र (तरल न हो, गाढ़ा हो), दुर्गन्ध युक्त हो, वह जल हितकारी नहीं है। समुद्र का पानी विस्र (आमगन्धी) तीनों दोषों को करने वाला; नमकीन होता है। इसलिये नहीं पीना चाहिये। यह आठवां जलवर्ग समाप्त हुआ॥ २१४-२१५॥ इति जलवर्गः। अथ दुग्धवर्गः। स्वादु शीतं मृदु स्निग्धं बहलं श्लक्ष्णपिच्छिलम्। गुरु मन्दं प्रसन्नं च गव्यं दशगुणं पयः॥ २१६॥ तदेवंगुणमेवौजः सामान्यादभिवर्धयेत्। प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुक्तं रसायनम्॥ २१७॥ महिषीणां गुरुतरं गव्याच्छीततरं पयः। स्नेहाऽन्यूनमनिद्राय हितमत्यग्नये च तत्॥ २१८॥ रूक्षोष्णं क्षीरमुष्ट्रीणामीषत्सलवणं लघु। शस्तं वात-कफानाह-कृमि-शोफोदरार्शसाम्॥ २१९॥ बल्यं स्थैर्यकरं सर्वमुष्णं चैकशफं पयः। साम्लं सलवणं रूक्षं शाखावातहरं लघु॥ २२०॥ छागं कषायमधुरं शीतं ग्राहि पयो लघु। रक्तपित्तातिसारघ्नं क्षय-कास-ज्वरापहम्॥ २२१॥ हिक्काश्वासकरं तूष्णं पित्तश्लेष्मलमाविकम्। हस्तिनीनां पयो बल्यं गुरु स्थैर्यकरं परम्॥ २२२॥ जीवनं बृंहणं सात्म्यं स्नेहनं मानुषं पयः। नावनं रक्तपित्ते च तर्पणं चाक्षिशूलिनाम्॥ २२३॥ १. सुश्रुत में भी कहा है—अनूपदेशे यद् वारि गुरु तत् श्लेष्मवर्धनम्। विपरीतमतो मुख्यं लघु जाङ्गलमुच्यते॥ सुश्रुत में कूप, तडाग, वापि झरने आदि के पानी के गुण पृथक्-पृथक् दिये हैं।