चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५२ चरकसंहिता [ अ० २७
जाता है। भूमि का जल इन छः गुणों वाला होता है। बरसात का पानी, बर्फ का पानी और कार अर्थात् ओले के पानी में कोई रस व्यक्त नहीं होता । आकाश से गिरते हुए पानी को नदी आदि स्थानों के अतिरिक्त, किसी शुद्ध पात्र में एकत्र कर लिया जाय तो इसे बरसात का पानी कहते हैं। यह पानी राजाओं के पीने योग्य है। ऋतु-ऋतु के अनुसार बरसात के पानी में गुण होते हैं। जो पानी थोड़ा कषाय, मधुर, पतला ( सूक्ष्म ), स्वच्छ, लघु, अरूक्ष अनभिष्यन्दि, कफ न करे, वह पानी उत्तम समझना चाहिये। बरसात का नया पानी गुरु, अभिष्यन्दि और मधुर रस होता है। शरद् ऋतु में बरसात का पानी बहुत स्वच्छ, लघु, अनभिष्यन्दि कफ नहीं करने वाला होता है। यह पानी सुकुमार, एवं विशेषतः स्निग्ध एवं बहुत भोजन खाने वाले पुरुषों के भोजन में, भक्षण ( दांत से काट कर खाने की वस्तुओं ) में, पीने और चाटने में भी प्रशस्त है। हेमन्त ऋतु में बरसात का पानी स्निग्ध, वीर्यवर्धक, बल- कारक, गुरु है। शिशिर ऋतु में बरसात का और हेमन्त ऋतु के पानी से कुछ हल्का एवं कफ-वातनाशक होता है। वसन्त ऋतु में बरसात का पानी कषाय, मधुर रस और रूक्ष होता है। ग्रीष्म ऋतु में बरसात का पानी कफनाशक और रूक्ष होता है, विभ्रान्त अर्थात् बरसात के दिनों में बादलों से जो पानी गिरता है वह निश्चित रूप में दोषकारक होता है। राजाओं, श्रीमन्तों, रईसों तथा सुकुमार पुरुषो को चाहिये कि वे शरद् ऋतु में बरसात के पानी को इकट्ठा करलें और सारे साल इसीका उपयोग करें। हिमालय से उत्पन्न नदियों का पानी पत्थरों की टक्कर के कारण मथे जाने से निर्दोष, पथ्यकारी, पुण्य है। इनको देवता व ऋषि सेवन करते थे, ये अति पुण्यकारी है। मलयाचल पर्वत से उत्पन्न नदियों का पानो पत्थर, रेतीली भूमि में बहने से स्वच्छ हो जाता है। इन का जल भी अमृत के समान है। पश्चिम समुद्र में गिरने वाली नदियां पथ्यकारी एवं स्वच्छ पानी वाली हैं। पूर्वीय समुद्र में गिरने वाली नदियां धीरे धीरे चलती हैं और गुरु पानी वाली हैं। पारियात्र पर्वत से उत्पन्न होनेवाली, विन्ध्याचल एवं सह्याद्रि के पहाड़ों से उत्पन्न नदियां शिरोरोग, हृदयरोग, कुष्ठ और श्लीपद रोग को उत्पन्न करती हैं। बरसात का पानी, मिट्टी, कृमि, कीट, सर्प, चूहा आदि के मलों से दूषित हो कर नदियों में जाकर मिलता है, इसलिये सब नदियों का पानी दूषित होता है इसलिये इस ऋतु में नदियों का पानी दोष बढ़ाने वाला होता है। वलाको,