चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 369, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५१ सलिलं तच्च दोषाय युज्यते नात्र संशयः । राजभी राजमात्रैश्च सुकुमारैश्च मानवैः ॥ २०६ ॥ संगृहीताः शरदद्यापः प्रयोक्तव्या विशेषतः । नद्यः पाषाण-विच्छिन्न-विक्षुब्धाभिहतोदकाः ॥ २०७ ॥ हिमवत्प्रभवाः पथ्याः पुण्या देवर्षिसेविताः । नद्यः पाषाण-सिकतावाहिन्यो विमलोदकाः ॥ २०८ ॥ मलयप्रभवा याश्च जलं तास्वमृतोपमम् । पश्चिमाभिमुखा याश्च पथ्यास्ता निर्मलोदकाः ॥ २०९ ॥ प्रायो मृदुवहा गुर्व्यो याश्च पूर्वसमुद्रगाः । पारियात्रभवा याश्च विन्ध्यसह्यभवाश्च याः ॥ २१० ॥ शिरोहृद्रोगकुष्ठानां ता हेतुः श्लीपदस्य च । वसुधा-कीट-सर्पाखु-मल-संदूषितोदकाः ॥ २११ ॥ वर्षाजलबहा नद्यः सर्वदोषसमीरणाः । वापी-कूप-तडागोत्स-सरः-प्रस्रवणादिषु ॥ २१२ ॥ आनूपशैलधन्वानां गुणदोषैर्विभावयेत् । पिच्छिलं कृमिलं क्लिन्नं पर्णशैवालकर्दमैः ॥ २१३ ॥ विवर्णं विरसं सान्द्रं दुर्गन्धि न हितं जलम् । विस्रं त्रिदोषं लवणमम्बु यद्दूरुणालयम् ॥ २१४ ॥ इत्यम्बुवर्गः प्रोक्तोऽयमष्टमः सुनिश्चितः । जलवर्गः समुद्दिष्टो मानवानां सुखप्रदः ॥ २१५ ॥ सम्पूर्ण पानी एक प्रकार का है । यह पानी बरसात के रूप में आकाश से गिरता है। यह गिरता हुआ, और गिरकर, [ गुण-दोष के लिये ] देश, समय की अपेक्षा करता है। आकाश से गिरता हुआ पानी ऋतु के अनुसार सूर्य, चन्द्रमा और वायु (आकाश में स्थित धूलि, तथा क्षुद्र जन्तु आदि परमाणुओं से मिलकर) तथा भूमि के ऊपर गिर कर उस ऋतु के अनुसार भूमि की शीतलता, उष्णिमा, स्निग्धता, रूक्षता आदि के सम्बन्ध होने पर उसी गुण वाला हो जाता है। आकाश से गिरता हुआ पानी स्वभाव से शीतल, पवित्र, कल्याणकारी, स्वादिष्ट, स्वच्छ, हल्का-इन छः गुणों वाला है। नीचे भूमि पर गिरकर पात्र की अपेक्षा से गुण वाला बन जाता है। श्वेत भूमि पर गिरने से पानी कसैला, पाण्डुर जमीन में तिक्त; कपिल भूमि अर्थात् क्षारमिश्रित (ऊसर में) नमकीन; पहाड़ की भूमि पर कटु और काली भूमि में मधुर हो