भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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२२ चरकसंहिता [ अ० १ युक्तमास्थापने मूत्रं युक्तं चापि विरेचने ॥ ९५ ॥ स्वेदेष्वपि च तद्युक्तमानाहेष्वगदेषु च । उदरेष्वथ चार्शःसु गुल्मकुष्ठकिलासिपु ॥ ९६ ॥ तद्युक्तमुपनाहेषु परिषेके तथैव च । दीपनीयं विषघ्नं च क्रिमिघ्नं चोपद्दिश्यते ॥ ९७ ॥ पाण्डुरोगोपसृष्टानामुत्तमं सर्वथोच्यते । श्लेष्माणं शमयेत्पीतं मारुतं चानुलोमयेत् ॥ ९८ ॥ कर्षेत्पित्तमधोभागमित्यस्मिन् गुणसंग्रहः । सामान्येन मयोक्तस्तु, पृथक्त्वेन प्रवक्ष्यते ॥ ९९ ॥ ये आठों प्रकार के मूत्र गरम, तीक्ष्ण, रूखे, कटु रस, और लवण रस से युक्त हैं। आठों प्रकार के मूत्र उत्सादन में, आलेपन में, प्रलेपन में, आस्थापन में निरूह में, विरेचन में, स्वेदन में, नाडीस्वेद में, आनाह अर्थात् अफारे में, अगद अर्थात् विषनाशक औषधियों में प्रयुक्त होते हैं। उदर रोगों में, अर्श रोग में, गुल्म, कुष्ठ (कोढ़) और किलास (कुष्ठ का भेद), उपनाह, पुल्टीस आदि में, परिषेक अर्थात् सेचन कार्य में, प्रयुक्त होते हैं। ये मूत्र (दीपन) अग्निदीपक, (विषघ्न) विषनाशक, और (क्रिमिघ्न) कृमि- नाशक कहे जाते हैं। ये पाण्डु रोगियों के लिये पान, आहार और भेषज आदि कल्पना में उत्तम, हितकारी हैं। पिया हुआ मूत्र श्लेष्मा (कफ) को शमन करता है, वायुको अनुलोमन करता है, और पित्त को अधोमार्ग में खींचता है, पित्त का विरेचन करता है। ये आठों मूत्रोंके सामान्य से गुण कह दिये हैं ॥९५-९९॥ आठों मूत्रोंमें से एक एक के जो पृथक् २ गुण हैं वह आगे कहे जाते हैं— अविमूत्रं सतिक्तं स्यात्स्निग्धं पित्ताविरोधि च । आजं कषायमधुरं पथ्यं दोषांस्त्रिहन्ति च ॥ १०० ॥ गव्यं समधुरं किंचिद्दोषघ्नं क्रिमिकुष्ठनुत् । कण्डूलं शमयेत्पीतं सम्यग्दोषोदरे हितम् ॥ १०१ ॥ अर्शःशोफोदरघ्नं तु सक्षारं माहिषं सरम् ! हास्तिकं लवणं मूत्रं हितं तु क्रिमिकुष्ठिनाम् ॥ १०२ ॥ प्रशस्तं बद्धविण्मूत्रविषश्लेष्मामयार्शसाम् । सतिक्तं श्वासकासघ्नमर्शोघ्नं चौष्ट्रमुच्यते ॥ १०३ ॥ वाजिनां तिक्तकटुकं कुष्ठव्रणविषापहम् । खरमूत्रमपस्मारोन्मादग्रहविनाशनम् ॥ १०४ ॥