भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० १ ] सूत्रस्थानम् २३ १. भेड़ का मूत्र थोड़ा तिक्त, स्निग्ध एवं पित्त का अविरोधी है, वह न तो पित्त को बढ़ाता है, और न पित्त को शमन करता है । २. बकरी का मूत्र कषाय और मधुर रस, शोथों के लिये हितकारी है, और त्रिदोषनाशक है । ३. गाय का मूत्र कुछ मधुर, दोषनाशक, कृमि, और कुष्ठ का नाशक है । इसके पीने से खाज शमन होती है, एवं वात आदि से उत्पन्न पेट के रोगों में हितकर है । ४. भैंस का मूत्र बवासीर, शोथ, और उदर रोगों को नाश करने वाला, थोड़ा खारा और मलभेदक है । ५. हाथी का मूत्र नमकीन, कृमि और कुष्ठ रोग वाले पुरुषों के लिये हितकारी है । अवरुद्ध मल और मूत्र रोग अलसक रोग, विष रोग, श्लेष्म जन्य रोगों और बवासीर में श्रेष्ठ है । ६. ऊँट का मूत्र थोड़ा तिक्त, श्वास, कास और अर्श रोग का नाशक है । ७. घोड़ों का मूत्र तिक्त और कटु, कुष्ठ, विष और व्रण का नाशक है । ८. गधे का मूत्र अपस्मार, (मृगी, हिस्टीरिया) उन्माद आदि (पागल- पन ) का नाशक है ॥ १००-१०४ ॥ आठ प्रकार के दूध— इतीहोक्तानि मूत्राणि यथासामर्थ्ययोगतः । अतः क्षीराणि वक्ष्यन्ते कर्म चैषां गुणाश्च ये ॥ १०५ ॥ अविशीरमजाक्षीरं गोक्षीरं माहिषं च यत् । उष्ट्रीणामथ नागीनां वडवायाः स्त्रियास्तथा ॥ १०६ ॥ इस प्रकार से इस शास्त्र में सामान्य और विशेष दोनों प्रकार से यथा- सामर्थ्य अर्थात् मूत्रों की जैसी जैसी शक्ति है, वैसे गुण कह दिये हैं । अब आठ प्रकार के दूध, इन के कर्म और गुण भी कहे जाते हैं:— १. भेड़ का, २. बकरी का, ३. गाय का, ४. भैंस का, ५. ऊँटनी का, ६. हथिनो का, ७. घोड़ी का और ८. स्त्रियों का दूध ॥१०५-१०६॥ सब दूधों के सामान्य गुण— प्रायशो मधुरं स्निग्धं शीतं स्तन्यं पयः स्मृतम् । प्रीणनं बृंहणं वृष्यं मेध्यं बल्यं मनस्करम् ॥ १०७ ॥ जीवनीयं श्रमहरं श्वासकासनिबर्हणम् । हन्ति शोणितपित्तं च संधानं विहतस्य च ॥ १०८ ॥ सर्वप्राणभृतां सात्म्यं शमनं शोधनं तथा ।