भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 443

अ० २ ] निदानस्थानम् ४२५ रक्तपित्तप्रकोषस्तु खलु पुरा दक्षयज्ञोद्ध्वंसे रुद्रकोपप्रभवाग्निना १ प्राणिनां परिगतशरीरप्राणानामनु ज्वरमभवत् २ ॥ ६ ॥ तस्याऽऽशुकारिणो दावाग्नेरिवाऽऽपतितस्यात्ययिकस्याऽऽशु प्रशान्तौ यतितव्यं मात्रां देशं कालं चाभिसमीक्ष्य संतर्पणेन वा मृदु-मधुर- शिशिर-तिक्त-कषायैरभ्यवहार्यैः प्रदेह-परिषेकावगाह-संस्पर्शनैर्वमना- द्यैर्वा तत्रावहितेनेति ॥ १० ॥ रक्तपित्त का इतिहास— प्राचीन काल में जिस समय रुद्र के गणों ने दक्ष के यज्ञ ३ का विध्वंस किया था । उस समय रुद्र के कोप से, सम्पूर्ण देहधारी प्राणियों को कष्ट देने वाले ज्वर के पीछे, अग्नि के समान उष्णशक्ति (रक्तपित्त) उत्पन्न हुआ । यह रक्तपित्त शीघ्र कार्य करने वाला, प्राणहारक एवं अग्नि के समान नाश करने वाला है। इसको शान्त करने का शीघ्र उपाय करना चाहिये । मात्रा, देश, काल आदि का विचार करके संतर्पण या अपतर्पण क्रिया द्वारा अथवा मृदु, मधुर, शीत, कटु, कषाय, रसयुक्त-भोजनों से, लेप, परिषेक, अवगाहन, संस्पर्शन, वमन आदि द्वारा सावधानी से चिकित्सा करनी चाहिये ॥१०॥ भवन्ति चात्र— साध्यं लोहितपित्तं तद्यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते । विरेचनस्य योगित्वाद् बहुत्वाद्भेषजस्य च ॥११॥ विरेचनं तु पित्तस्य जयार्थे परमौषधम् । यश्च तत्रान्वयः श्लेष्मा तस्य चानघमं स्मृतम् ॥१२॥ भवेद्योगावहं तत्र मधुरं चैव भेषजम् । तस्मात्साध्यं मतं रक्तं यदूर्ध्वं प्रतिपद्यते ॥१३॥ ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त साध्य— जो रक्तपित्त ऊर्ध्वमार्गगामी हो, वह साध्य है, क्योकि इसमें विरेचन द्वारा चिकित्सा की जाती है और विरेचन की ओषधियां बहुत हैं। ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त में पित्तदोष प्रधान होता है, और कफ दोष गौण होता है। पित्तदोष को शान्त करने के लिये विरेचन परम श्रेष्ठ क्रिया है। और जो कफ इसमें अनुबन्ध रूप में रहता है, इसके लिये विरेचन मध्यम उपाय है। कषाय और तिक्त रसों के सिवाय मधुर रस भी अन्य १. 'दक्षयज्ञध्वंसे रुद्रकोषामर्षाग्निना' इति पाठः । २. 'मभवज्ज्वरमनु' इति वा पाठः । ३. यह इतिहास आलंकारिक है । दक्ष का यज्ञ इस देह में ही है। रुद्र शिव जाठराग्नि है। उसके विकृत होने से ही रोग उत्पन्न होते हैं।