चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२६ चरकसंहिता [ अ० २ औषधियो के साथ मिलकर योगवाही हो जाता है । इसलिये ऊर्ध्वगामी रक्त- पित्त साध्य हैं ॥११-१३॥ रक्तं तु यदधोभागं तद्याप्यमिति निश्चयः । वमनस्याल्पयोगित्वादल्पत्वाद्भेषजस्य च ॥ १४ ॥ वमनं हि न पित्तस्य हरणे श्रेष्ठमुच्यते । यश्च तत्रानुगो वायुस्तच्छान्तौ चावरं मतम् ॥१५॥ तच्चायोगवहं तत्र कषायं तिक्तकानि च । तस्माद्याप्यं समाख्यातं यदुक्तमनुलोमगम् ॥ १६ ॥ अधोगामी रक्तपित्त याप्य—जो रक्तपित्त अधोमार्गगामी है वह याप्य है । क्योंकि पित्त को जीतने के लिये 'वमन' पूर्णरूप से पर्याप्त क्रिया नहीं है और वमन की औषधियां भी कम हैं । कफ दोष के साथ मिश्रित पित्त को निकालने में वमन पर्याप्त है । परन्तु रक्तपित्त के मूलरूप पित्त को निकालने में वमन श्रेष्ठ नहीं है । इसमें अनुबन्ध रूप से रहने वाले वायु को शमन करने के लिये वमन क्रिया निरुपयोगी है । इसी प्रकार कषाय और कटु रस जो रक्तपित्त के नाशक हैं, वे रस वायु को बढ़ाने वाले हैं इसलिये योगों में इनका उपयोग नहीं किया जा सकता इसलिये अधोगामी रक्तपित्त याप्य हो जाता है ॥ १४-१६ ॥ रक्तपित्तं तु यन्मार्गौ द्वावपि प्रतिपद्यते । असाध्यमिति तज्ज्ञेयं पूर्वोक्तादपि कारणात् ॥१७॥ न हि संशोधनं किंचिदस्त्यस्य प्रतिमार्गगम् । प्रतिमार्गं च हरणं रक्तपित्ते विधीयते ॥ १८ ॥ एवमेवोपशमनं सर्वशो नास्य विद्यते । उभयमार्गगामी असाध्य रक्तपित्त—दोनों मार्गों से जाने वाला रक्तपित्त, उपरोक्त कारणों से असाध्य हो जाता है । क्योंकि ( १ ) इसके प्रति- कूल मार्ग के लिये संशोधन-चिकित्सा किसी प्रकार की भी नहीं है । और ( २ ) रक्तपित्त में विरुद्ध मार्ग से संशोधन कार्य गुणकारी होता है । इसलिये सब प्रकार की शान्ति करने वाले कोई भी औषध नहीं है ॥ १७-१८ ॥ संसृष्टेषु च दोषेषु सर्वजिच्छमनं मतम् ॥ १६ ॥ इत्युक्तं त्रिविधोदर्कं रक्तं मार्गविशेषतः । द्वि-दोषों से व त्रि-दोषज रक्तपित्त की चिकित्सा—संसृष्ट दो दोषों या तीनों दोषों से मिश्रित रक्तपित्त में सब दोषों को शमन करने वाली औषधि देनी