भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 453

अ० ३ ] निदानस्थानम् ४१५ गुल्म का पूर्वरूप-इन पांचो प्रकार के गुल्मों की उत्पत्ति से पूर्व निम्न- लिखित लक्षण होते हैं । यथा-अन्न में अनिच्छा, अरुचि, अविपाक, अग्नि की विषमता ( कभी तेज़ और कभी मन्द ), विदाह ( जलन ), भोजन के पचने के समय जलन, बिना कारण के वमन और डकार आना, अधोवायु, मूत्र व मलों की अप्रवृत्ति अथवा प्रवाहण की प्रवृत्ति होने पर भी मलादि का बाहर न निकलना, अथवा थोड़ा आना, वातशूल, पेट में गुड़-गुड़ाहट, आंतों में अफारा, शरीर में रोमांच, गांठदार मल का आना, भूख का न लगना, कृशता, पेट भर अन्न खाने पर उसका सहन न होना, इत्यादि लक्षण सब प्रकार के गुल्मों के पूर्वरूप हैं ॥ १६ ॥ सर्वेष्वपि च खल्वेतेषु न कश्चिद्वातादृते संभवति गुल्मः ॥ १७ ॥ इन सब प्रकार के गुल्मों का मूलभूत कारण वायु ही है, वायु के बिना कोई भी गुल्म नहीं होता ॥१७॥ तेषां सन्निपातजमसाध्यं ज्ञात्वा नोपक्रमेत । एकदोषजे तु यथा- स्वमारम्भं प्रणयेत् । संसृष्टांस्तु साधारणेन कर्मणोपचरेत् । यच्चान्य- दप्यविरुद्धं मन्येत तदवचारयेद्विभज्य गुरुलाघवमुपद्रवाणां समीक्ष्य, गुरून्‌उपद्रवांस्त्वरमाणश्चिकित्सेज्जघन्यमितरान् , त्वरमाणस्तु विशेषमनु- पलभ्य गुल्मेष्वात्ययिके कर्मणि वातचिकित्सितं प्रणयेत् , स्नेहस्वेदौ वातहरौ, स्नेहोपसंहितं च मृदुविरेचनं, वस्तींश्चाम्ललवणमधुरांश्च रसान् युक्तितोऽवचारयेत् । मारुते ह्युपशान्ते स्वल्पेनापि प्रयत्नेन शक्योऽन्योपि दोषो नियन्तुं गुल्मेष्विति ॥ १८ ॥ इनमें सन्निपातजन्य गुल्म को असाध्य समझ कर चिकित्सा में हाथ नहीं डालना चाहिये। एक दोष से उत्पन्न गुल्म की यथायोग्य रीति से चिकित्सा करनी चाहिये । दो दोषवाले गुल्मों की चिकित्सा साधारण प्रकार से करनी चाहिये । अथवा वैद्य रोगी के उपद्रवों की गुरुता लघुता को देखकर, दूसरे किसी से चिकित्सा विरुद्ध न पड़े, इस प्रकार से चिकित्सा आरम्भ करनी चाहिये । जो उपद्रव गुरु हों, उनकी तत्काल चिकित्सा करनी चाहिये और जो उपद्रव कम हों, उन की पीछे से चिकित्सा करनी चाहिये । जिस गुल्म में कुछ पता न चलता हो या काम ज़रूरी या जल्दी करना हो तो प्रथम वायु की चिकित्सा करनी चाहिये । क्योंकि वायु को शान्त करने के लिये स्नेहन, मृदु विरेचन, बस्तिकर्म, खट्टा, नमकीन और मधुर रस युक्तिपूर्वक देने चाहिये । वायु के । होजाने पर थोड़े से परिश्रम से दूसरे दोष भी सुगमता से वश में किये जा सकते हैं ॥ १८ ॥