चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ
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४१६ चरकसंहिता [ अ० ४
भवति चात्र—
गुल्मिनाम निलशान्तिरुपा यैः सर्वशो विधिवदाचरितव्या ।
मारुते ह्यवजितेऽन्यमुदीर्णं दोषमल्पमपि कर्म निहन्यात् ॥ १६ ॥
गुल्मरोग में वायु को शान्त करने के लिये सम्पूर्ण विधि काम में लानी
चाहिये । क्योंकि वायु को शान्त न करने पर दूसरा थोड़ा सा बढ़ा हुआ दोष
भी सम्पूर्ण किये कराये पर पानी फेर देता है ॥ १६ ॥
तत्र श्लोकाः—संख्या निमित्तं रूपाणि पूर्वरूपमथापि च ।
दृष्टं निदाने गुल्मानामेकदेशश्च कर्मणाम् ॥ २० ॥
इस गुल्म निदान में गुल्मों की संख्या, कारण, पूर्वरूप और चिकित्सा
कह दी हैं ॥ २० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने गुल्मनिदानं
नाम तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः
अथातः प्रमेहनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे प्रमेह-निदान का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥२॥
त्रिदोषप्रकोपानिमित्ता विंशतिः प्रमेहा भवन्ति, विकाराश्चापरेऽ-
परिसंख्येयाः । तत्र यथा त्रिदोषप्रकोपः प्रमेहानभिनिर्वर्तयति तथाऽ-
नुव्याख्यास्यामः ॥ ३ ॥
प्रमेहों की संख्या—वात आदि तीनों दोषों से उत्पन्न होने वाले प्रमेह बीस
प्रकार के हैं, इनके सिवाय दूसरे रोग असंख्य हैं । त्रिदोष के कोप से प्रमेह
किस प्रकार उत्पन्न होते हैं इसका आगे वर्णन करते हैं ॥३॥
इह खलु निदान-दोष-दूष्य-विशेषेभ्यो विकार-विघात-भावाभाव-
प्रतिविशेषा भवन्ति ॥ ४ ॥
निदान, दोष और दूष्य इनके विशेष-भेदों को लेकर रोगों के विघात
अर्थात् रोग का देर में होना, थोड़ा या अधिक विकार होना आदि
भाव-विशेष उत्पन्न होते हैं । इस सूत्रात्मक सिद्धान्त को विस्तार
कहते हैं ॥४॥