भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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४६४ चरकसंहिता [ अ० ७

(अपि तु रज और तम हों), जिन में वात आदि दोष बढ़े हुए हों, जो अपवित्र बिगड़े हुए एवं विरोधी गुणवाले पदार्थों से मिले, अथवा कुष्ठ आदि के रोगी मनुष्यों द्वारा खाये हुए अन्न पान खाते हों, विषम रीति से भोजन करने वाले व्यक्तियों में, शास्त्रोक्त विधि के विरुद्ध आचरण करने वाले पुरुषों में, अथवा कोई अन्य प्रकार की विषम चेष्टा करने वाले व्यक्तियों में, जिन का शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया हो, जिनका चित्त रोग के वेग के कारण उद्भ्रान्त हो चुका हो, जिन का मन, काम, क्रोध, लोभ, हर्ष, भय, मोह, आयास, (थकान), शोक, चिन्ता और उद्वेग आदि द्वारा दुःखित होता है, घाव या चोट के लगने से जिनका मन ठिकाने पर नहीं रहता तथा बुद्धि चलायमान हो गई हो, ऐसे मनुष्यों के वात आदि दोष प्रकुपित होकर, हृदय को दूषित करके (हृदय में पहुंचकर) मनोवह स्रोतों की गति को बन्द करके उन्माद रोग उत्पन्न करते हैं ॥ ३ ॥

उन्मादं पुनर्मनो-बुद्धि-संज्ञा-ज्ञान-स्मृति-भक्ति-शील-चेष्टाचार- विभ्रमं विद्यात् ॥ ४ ॥

उन्माद का लक्षण—मन, बुद्धि, संज्ञा, ज्ञान, स्मृति, भक्ति, शील, आहार, चेष्टा इनका विभ्रम अर्थात् विक्षिप्त होना 'उन्माद' कहाता है, इन के विकार से उन्माद-रोग होता है १ ॥४॥

तस्येमानि पूर्वरूपाणि। तद्यथा—शिरसः शून्यभावश्चक्षुषोराकुलता, स्वनः कर्णयोरुच्छ्वासस्याऽऽधिक्यमास्यसंस्रवणमनन्नाभिलाषोऽरोचका- विपाकौ हृदयग्रहो ध्यानायाससंमोहोद्वेगाश्चास्थाने सततं लोमहर्षो ज्वरश्चाभीक्ष्णमुन्मत्तचित्तत्वमुदीर्तिवमर्दिताकृतिकरणं च व्याधेः स्वप्ने च दर्शनमभीक्ष्णं भ्रान्तचलितावनवस्थितानां च रूपाणामप्रशस्तानां


१. मन चिन्तन का काम करता है, उस के विभ्रम से चिन्तन करने योग्य बातों को नहीं सोचता और चिन्तन न करने योग्य बातों की चिन्ता करता है। बुद्धि के विभ्रम से नित्य को अनित्य और प्रिय को अप्रिय देखने लगता है। संज्ञा, ज्ञान इस के विभ्रम से अग्नि से जलने की प्रतीति नहीं होती। स्मृति के विभ्रम से कुछ स्मरण नहीं होता या उल्टा स्मरण होता है। भक्ति अर्थात् इच्छा, इस के विभ्रम से पहिले जहां इच्छा थी वहां अनिच्छा हो जाती है। शील के विभ्रम से अति क्रोधी वा क्रोध के स्थान में भी जाता है। आचार के विभ्रम से अपवित्र आचरण करता है।