चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 483, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ७] ३० निदानस्थानम् ४५१ तिक्ष्णोडक-चक्राधिरोहणं वातकुण्डलिकामिश्नोन्मथनं निमज्जनं कङ्क- षाणामम्भसामावर्तेषु चक्षुषोश्चापसर्पणमिति दोषनिमित्तानामुन्मादानां पूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ ५ ॥ उन्माद के पूर्वरूप—उन्माद के पूर्वरूप निम्नलिखित हैं । यथा—शिर (मस्तिष्क) का खालीपन, आंखों में चंचलता, कानों में ध्वनि का होना, श्वास का ज़ोर से चलना, मुख से लार गिरना, भोजन में अनिच्छा, अरुचि अविपाक, हृदयग्रह, बेमौके ध्यान, आयास (थकान), संमोह और उद्वेग होना, अर्थात् जहां पर न करने हों वहां इन का करना, निरन्तर रोमांच रहना, बार बार ज्वर का आना, चित्त का उन्मत्त रहना, उदर्द, कोठ निकलना (अंगों का सूजन या शरीर के उर्ध्व भाग में पीड़ा होना), अर्दित (मुख की आकृति का आधा टेढ़ा बनना), बुद्धि आदि का भ्रम होना, स्वप्न में भ्रान्त, चलित, चंचल या भयंकर स्वरूपों का बार-बार दीखना, अप्रशस्त कोल्हू (जिस यन्त्र से तेल निकाला जाता है) आदि उन पर बैठना, वातकुण्ड- लिका-रोग (मूत्ररोध विकार) का होना, गन्दे, खराब पानी के भवरों में खेलना, डुबकी मारना आदि, आंखों की अस्थिरता और चंचलता, दोषजन्य उन्मादों के ये पूर्वरूप हैं ॥ ५ ॥ ततोऽनन्तरमुन्मादाभिनिर्वृत्तिः, तत्रेहमुन्मादविशेषविज्ञानं भव- ति । तद्यथा परिसर्पणमक्षिभ्रुवोमोष्ठांस-हनु-हस्त-पाद-विक्षेपणमकस्मात्, अनियतानां च सततं गिरामुत्सर्गः, फेनागमनमास्यात्, स्मित-हसित- नृत्य-गीत-वादित्रादिप्रयोगाश्चास्थाने, वीणा-वंश-शङ्ख-शम्या-ताल-शब्दा- नुकरणमसाध्रा, यानमयानैरलङ्करणमनलङ्कारिकैर्द्रव्यैर्लोभोऽभ्यवहा- र्येष्वलव्धेषु, लब्धेषु चावमानस्तात्रं मात्सर्यं, कार्यं, पारुष्यमु- त्पिण्डताऽरुणाक्षता, वातोपशयविपर्ययादनुपशयता चेति वातोन्माद- लिङ्गानि भवन्ति ॥ ६ ॥ इन पूर्वरूपों के प्रकट होने के पीछे उन्माद रोग उत्पन्न होता है । उस समय उन्माद-रोग के विशेष लक्षण ये होते हैं:— (१) वातोन्माद के लक्षण—आंख और भौंहों का चलाते रहना (अस्थि- , जबड़ा (हनु), कन्धा, हाथ और पांव का फेंकना, बिना स्थान ः के) हंसना-मुसकुराना, नाचना, गाना, बजाना, वीणा