चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ चरकसंहिता [ अ० २ बृहती ( बड़ी कटेरी ), एरण्ड ( एरण्डमूल ), पुनर्नवा ( सांठी घास ), यव ( जौ ), कुलत्थ ( कुलथी ), कोल (बेर), गुडूचा (गिलोय), मदन ( मैनफल ), पलाश (ढाक), कत्तृण ( रोहिष तृण ), स्नेह ( चारों स्नेह घी आदि ), लवण ( पांचों नमक ) ये उनतीस द्रव्य ( उदावर्त्त ) अपान वायु की ऊर्ध्व गति होने पर, विबन्ध मल मूत्र आदि के अवरोध में और आस्थापन नामक बस्ति कर्म में प्रयोग करने चाहिये। इन्हीं औषधियों से अनुवासन बस्ति बना कर वायु को नष्ट करने के लिये प्रयोग करनी चाहिये। यह संक्षेप में पंच कर्म ( वमन, विरे- चन, नस्य, आस्थापन और अनुवासन ) कह दिये हैं ॥ ११-१४ ॥ तान्युपस्थितदोषाणां स्नेहस्वेदोपपादनैः। पञ्च कर्माणि कुर्वीत मात्राकालौ विचारयन् ॥ १५ ॥ प्रवृत्त होने के लिये तैयार दोष वालों को स्नेहन और स्वेदन कराके, शरीर-बल की अपेक्षा से मात्रा और काल का विचार करके वैद्य पंच कर्मों को करावे ॥ १५ ॥ मात्रा और काल के विचार करने की आवश्यकता : मात्राकालाश्श्रया युक्तिः, सिद्धिर्युक्तौ प्रतिष्ठिता । तिष्ठत्युपरि युक्तिज्ञा द्रव्यज्ञानवतां सदा ॥ १६ ॥ पदार्थों की योजना मात्रा और काल पर अवलम्बित है। शरीरबल, अग्नि- बल, आयु, व्याधिबल, दोषबल आदि के अनुकूल मात्रा और विशेष समय में प्रयुक्त हुआ द्रव्य भली प्रकार अपने कार्य को कर सकता है ।¹ सिद्धि चिकि- त्सित क्रिया की सफलता युक्ति में आश्रित है । योजना का जानने वाला वैद्य द्रव्य-औषध को जानने वालों में से सदा श्रेष्ठ है। ऊपर स्वस्थ तथा आतुर पुरुषों के लिये पंच कर्मों का उपदेश कर चुके ॥ १६ ॥ रोगियों के लिये आहार विशेष यवागूः— अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि यवागूर्विविधौषधाः । विविधानां विकाराणां तत्साध्यानां निवृत्तये ॥ १७ ॥ इसके आगे यवागू से अच्छे होने वाले नाना प्रकार के रोगों के नाश के लिये नाना प्रकार की औषधियों से सिद्ध यवागू ( लप्सी ) कहेंगे ॥ १७ ॥ पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः । यवागूर्दीपनीया स्याच्छूलघ्नी चोपसाधिता ॥ १८ ॥ १. जिस प्रकार मृदु-विरेचक ओषधियां रात्रि को सोते समय लेने से उत्तम गुण करती हैं।