चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० २ ] ३ सूत्रस्थानम् ३३
चूंकि आरोग्य का मूल साधन कोष्ठाग्नि है, इस लिये सब से मुख्य वस्तु कोष्ठाग्नि है। अतः अग्नि को सन्दीपन करने के लिये यवागू कहते हैं, (१) पिप्पली, पिप्पली मूल (पीपला मूल), (चव्य) चविका, (चित्रक) चीता, सोंठ इन से बनाई हुई यवागू (दीपनी) अग्निवर्धक और शूलनाशक होती है ॥ १८ ॥ यवागू तीन प्रकार की है, १. यवागू जो छः गुने जल में पकती है, २. मण्ड चौदह गुने जल में और ३. विलेपी चार गुने जल में पकाई जाती है। दधित्थ-बिल्व-चाङ्गेरी-तक्र-दाडिम-साधिता । पाचनी ग्राहिणी पेया, सवाते पञ्चमूलिकी ॥ १९ ॥ (२) दधित्थ (कैथ), विल्व (बेलागरी-गूदा), चांगरी (चोपत्तिया), तक्र (छाछ), दाडम (अनारदाना) इन से बनाई हुई यवागू 'पाचनी' पाचन करने वाली 'ग्राहिणी' अर्थात् स्तम्भक वा मल को रोकने वाली है। (३) पंच मूल बृहत्पञ्चमूल-शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बड़ी कटेरी और गोखरू-यह पांच वातहर हैं इनसे साधित यवागू वातविकार के लिये उप- योगी है ॥ १६ ॥ शालपर्णी-बला-बिल्वैः पृश्निपर्ण्या च साधिता । दाडिमाम्ला हिता पेया पित्तश्लेष्मातिसारिणाम् ॥ २० ॥ (४) शालपर्णी (सालवन), बला (खरैंटी), बिल्व (बेलगिरी), और पृश्निपर्णी (पीतापर्णी) इन से बनाई तथा अनार के रस से खट्टी की हुई यवागू पित्त-श्लेष्म जन्य अतिसार रोग में हितकारी है ॥ २० ॥ पयस्यर्धोदके छागे ह्रीबेरोत्पलनागरैः । पेया रक्तातिसारघ्नी पृश्निपर्ण्या च साधिता ॥ २१ ॥ (५) बकरी का जितना दूध हो, उससे आधा पानी इस में मिला कर (मिलित परिमाण छः गुना), ह्रींबेर (नेत्रवाला), उत्पल (कमलगट्टा) और सोंठ, और पृष्ठपर्णी (पिठवन) ये एक कर्ष मात्रा लेकर यवागू सिद्ध करनी चाहिये। यह यवागू रक्तातिसार को नष्ट करती है ॥ २१ ॥ १. पिप्पली आदि सब साधन द्रव्य मिलकर एक कर्ष अर्थात् चार मासे लेने चाहिये। इसको थोड़ा कूट लेना चाहिये, पकाने में आधा पानी जलाना चाहिये, पानी की मात्रा के भेद से नाना भेद हो जाते हैं।