चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ चरकसंहिता [ अ० २
दद्यात्सातिविषां पेयां सामे साम्लां सनागराम् । श्वदंष्ट्राकण्टकारीभ्यां मूत्रकृच्छ्रे सफाणिताम् ॥ २२ ॥ (६) अतिविषा (अतीस), नागर (सोंठ) इनके कषाय अथवा कल्क से छः गुने जल में यवागू सिद्ध करे, इसे अनार के रस से खट्टी कर के आमा- तिसार (रक्तातिसार) में दे । (७) मूत्र कृच्छ्र रोग में श्वदंष्ट्रा (गोखरू) और कण्टकारी (कटेरी) इन के कषाय या कल्क से छः गुने जल में यवागू सिद्ध करके इस में फाणित (राब, आधा पका गुड़) डाल दे ॥ २२ ॥ विडङ्ग-पिप्पलीमूल-शिग्रुभिर्मरिचेन च । तक्रसिद्धा यवागूः स्यात्कृमिघ्नी ससुवर्चिका ॥ २३ ॥ (८) वायविडंग, पिप्पलीमूल, शिग्रु (सहजना) और मरिच इनके कल्क से छः गुने तक्र में सिद्ध की हुई यवागू में सुवर्चिका (सौंर्चल नमक) डालकर रोगी को देने से कृमि नष्ट होते हैं। यहाँ पानी के स्थान पर तक्र का प्रयोग करे ॥ मृद्वीका-सारिवा-लाजा-पिप्पली-मधुनागरैः । पिपासाघ्नी, विषघ्नी च सोमराजीविपाचिता ॥ २४ ॥ (६) मृद्वीका (द्राक्षा दाख) सारिवा (अनन्त मूल) लाजा (खीलें), पिप्पली, और सोंठ इन के कल्क या कषाय से यवागू को छः गुने जल में सिद्ध करे । ठण्डा होने पर इस में शहद मिला कर पीने से प्यास शान्त होती है । (१०) सोमराजी (बावची) से सिद्ध की हुई यवागू 'विषघ्नी' अर्थात् खाये हुए विष को नष्ट करने वाली है ॥ २४ ॥ सिद्धा वराहनियूहे यवागूर्बृंहणी मता । गवेधुकानां भृष्टानां कर्षणीया समाक्षिका ॥ २५ ॥ (११) सुअर के मांस रस में सिद्ध की हुई यवागू पुष्टि कारक होती है । (१२) भूने हुए गेहुओं के सत्तू से बनाई हुई यवागू में शहद मिला कर लेने से शरीर पतला होता है ॥ २५ ॥ सर्पिष्मती बहुतिला स्नेहनी लवणान्विता । कुशामलकनियूहे श्यामाकानां विरूक्षणी ॥ २६ ॥ (१३) घी वाली, तिलयुक्त नमकीन यवागू स्नेहकारक है। यह शरीर को स्निग्ध करती है। तिलों के साथ कुछ चावल मिला लें। यवागू सिद्ध करके फिर इस में घी और नमक मिलावें ।