भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 511

वाले पदार्थ के सेवन करने से, विरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों के सेवन से उत्पन्न होने वाले (कुष्ठ, वीसर्प आदि) रोगों से मनुष्य बचा रहता है, इसलिये अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को खावे ॥ ३५ ॥ इष्टे देशेऽश्नीयात् । इष्टे हि देशे भुञ्जानो नानिष्टदेशजैर्मनोवि- घातकरैर्भावैर्मनोविघातं प्राप्नोति, तथेष्टैः सर्वोपकरणैः, तस्मादिष्टे देशे तथेष्टसर्वोपकरणं चाश्नीयात् ॥ ३६ ॥ अभिमत प्रदेश में मनोनुकूल उपकरणों के साथ भोजन करे । मनो- वाञ्छित स्थान में भोजन करने से, अनिष्ट देश में उत्पन्न होने वाले, मन को दुःखी करने वाले भावों से मनुष्य दुःखी नहीं होता है। यही बात मन के अनुकूल उपकारणों के साथ भी जाने । इसलिये इष्ट स्थान में और अभिमत उपकरणों के साथ भोजन करें ॥ ३६ ॥ नातिद्रुतमश्नीयात्, अतिद्रुतं हि भुञ्जानस्योत्स्नेहनमवसादनं, भोज- नस्याप्रतिष्ठानं, भोज्यदोषसाद्गुण्यौपलब्धिश्च न नियता, तस्मान्नाति- द्रुतमश्नीयात् ॥ ३७ ॥ बहुत जल्दी जल्दी भोजन नहीं करे। बहुत जल्दी भोजन खाने से भोजन उन्मार्ग अर्थात् विरुद्ध मार्ग में जाने लगता है। जल्दी खाया हुआ भोजन अवसन्नता पैदा करता है, तथा भोजन आमाशय में नहीं रहता, वमन हो जाता है। जल्दी खाने से भोजन के गुण दोष की पहिचान भी नहीं होती, इसलिये बहुत जल्दी भोजन नहीं करे ॥ ३७ ॥ नातिविलम्बितमश्नीयात् । अतिविलम्बितं हि भुञ्जानो न तृप्तिम- धिगच्छति, बहु भुङ्क्ते, शीतीभवति चाऽऽहारजातं, विषमपाकं च भवति, तस्मान्नातिविलम्बितमश्नीयात् ॥ ३८ ॥ बहुत धीरे रुक रुक कर भी भोजन नहीं करे। बहुत धीरे धीरे खाने से पुरुष को कभी तृप्ति नहीं होती, इसलिये बहुत खा जाता है। भोजन भी ठण्डा पड़ जाता है, भोजन विषम रूप में पचता है, इसलिये बहुत धीरे धीरे भोजन नहीं करे ॥ ३८ ॥ अञ्जल्पन्नहसंस्तन्मना भुञ्जीत—जल्पतो हसतोऽन्यमनसो वा भुञ्जा- नस्य त एव हि दोषा भवन्ति य एवातिद्रुतमश्नतः, तस्मादजल्पन्नह- संस्तन्मना भुञ्जीत ॥ ३९ ॥ बातें न करते हुए या न हंसते हुए मनोयोग के साथ भोजन करे। बातें हुए और हंसते हुए अथवा दूसरी तरफ अन्य कार्य में मन को लगाये