चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६४ चरकसंहिता [ अ० २ हुए भोजन करने पर वे ही दोष उत्पन्न होते हैं जो जल्दी खाने में उत्पन्न होते हैं । इसलिये बिना बोले, बिना हंसे, पूर्ण मनोयोग के साथ भोजन करे ॥ ३९ ॥ आत्मानमभिसमीक्ष्य भुञ्जीत सम्यक् । इदं ममोपशेते, इदं नोपशेते इति, विदितं ह्यस्य आत्मन आत्मसात्म्यं भवति, तस्मादात्मानमभि- समीक्ष्य भुञ्जीत सम्यगिति ॥ ४० ॥ अपनी रुचि वा हित-अहित को देखकर भोजन करे । मेरी आत्मा को यह अनुकूल है, यह प्रतिकूल है, यह मेरे सात्म्य है, यह मेरे असात्म्य है, ऐसा विचार कर खावे । इस प्रकार खाने से आत्मसात्म्य का ज्ञान रहता है । इसलिये अपनी शक्ति और हित-अहित का विवेचन करके खाना चाहिये ॥४०॥ भवति चात्र—रसान् द्रव्याणि दोषांश्च विकारांश्च प्रभावतः । वेद यो देशकालौ च शरीरं च स नो भिषक् ॥ ४१ ॥ जो पुरुष रस, द्रव्य, दोष, विकार, प्रभाव, देश, काल, शरीर ( प्रकृति, सत्त्व और सात्म्य ) इन को भली प्रकार जानता है वही हम में से वैद्य होने योग्य है ॥ ४१ ॥ तत्र श्लोकौ—विमानार्थो रसद्रव्यदोषरोगाः प्रभावतः । द्रव्याणि नातिसेव्यानि त्रिविधं सात्म्यमेव च ॥ ४२ ॥ आहारायतनान्यष्टौ भोज्यसाद्गुण्यमेव च । विमाने रससंख्याते सर्वमेतत्प्रकाशितम् ॥ ४३ ॥ विमानस्थान का प्रयोजन, रस, द्रव्य, दोष और रोग इन चारों का प्रभाव, बहुत अधिक सेवन न करने योग्य द्रव्य, तीन प्रकार का सात्म्य, आठ आहार विधि के आयतन, भोजन का साद्गुण्य, ये सब बातें इस 'रस' संज्ञक विमान में भगवान् आत्रेय ने प्रकाशित कर दी हैं ॥ ४२-४३ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने रसविमानं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः । —०*०— अथातस्त्रिविधकुक्षीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब इसके आगे 'त्रिविध कुक्षीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करें जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥