भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 513

अ० २ ] विमानस्थानम् ४६५ त्रिविधं कुक्षौ स्थापयेदवकाशांशमाहारस्याऽऽहारमुपयुञ्जानः; तद्यथा- कमवकाशांशं मूर्तानामाहारविकाराणामेकं द्रवाणामेकं पुनर्वातपित्त- श्लेष्मणाम् । एतावती ह्याहारमात्रामुपयुञ्जानो नामात्राहारजं किञ्चि- दशुभं प्राप्नोति ॥ ३ ॥ आहार करने वाले मनुष्य को चाहिये कि वह भोजन के निमित्त पेट में तीन विभागों की कल्पना करे । एक स्थान मूर्त्त (स्थूल) आहार के लिये, दूसरा द्रव (पेय) पदार्थों के लिये और तीसरा वात, पित्त और कफ के लिये । इस प्रकार तीन विभाग करके आहार मात्रा का उपयोग करनेवाले पुरुष को आहार की अमात्रा से उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रकार के अशुभ परिणाम नहीं होते ॥ ३ ॥ न च केवलं मात्रावत्त्वादेवाऽऽहारस्य कृत्स्नमाहारफलसौष्ठवमवाप्तुं शक्यं, प्रकृत्यादीनामष्टानामाहारविधिविशेषायतनानां प्रविभक्त- फलत्वात् ॥ ४ ॥ तत्र तावदाहारराशिमधिकृत्य मात्रामात्राफलविनिश्चयार्थः प्रकृतः। एतावानेव ह्याहारराशिविधिविकल्पो यावन्मात्रावत्त्वममात्रा- वत्त्वं च ॥ ५ ॥ केवल आहार की मात्रा से ही सम्पूर्ण आहार फल की उच्चमता प्राप्त नहीं हो सकती, क्योंकि प्रकृति आदि जो आठ आहार-विधि के विशेष अंग हैं, इन का भी भिन्न भिन्न फल होता है । यहां पर प्रकृति आदि आठ आहार-विधि विशेषों में आहार की राशि को लेकर मात्रा और अमात्रा के फल का निश्चय करने के लिये यह प्रकरण है । आहार की राशि-विधि का भेद इतना ही है कि मात्रा का परिमाण इतना और अमात्रा का परिमाण इतना है ॥४-५॥ तत्र मात्रावत्त्वं पूर्वमुपदिष्टं कुक्ष्यंशविभागेन, तद् भूयो विस्तरे- णानुव्याख्यास्यामः । तद्यथा—कुक्षेरप्रपीड़नमाहारेण, हृदयस्यानव- रोधः, पार्श्वयोरविपाटनं, अनतिगौरवमुदरस्य, प्रीणनमिन्द्रियाणां, क्षुत्पिपासोपरमः, स्थानासन-शयन-गमन-प्रश्वासोच्छ्वास-हास-संकथासु च सुखानुवृत्तिः, सायं प्रातश्च सुखेन परिणमनं, बलवर्णोपचयकरत्वं चेति मात्रावतो लक्षणमाहारस्य भवति ॥ ६ ॥ इन में मात्रावत्त्व (मात्रा) को कुक्षि के विभाग से प्रथम संक्षेप में कह चुके हैं। अब मात्रा और अमात्रा दोनों को विस्तार से कहते हैं। जैसे— आहार से कोष्ठ का पीड़ित (दबना) न होना, हृदय (श्वास प्रश्वास) का