भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 514

४८६ चरकसंहिता [ अ. २

न रुकना, भोजन के भार से पाश्र्वों का न फटना ( फटते हुए प्रतीत न होना, अधिक न तनना ), पेट में बहुत भारीपन का प्रतीत न होना, आंख आदि इन्द्रियों का पूर्ण सन्तुष्ट होना, भूख और प्यास का शान्त होना, स्थान ( सीधा खड़ा होने में ) आसन ( बैठने में ), सोने में, चलने में, श्वास लेने एवं छोड़ने में, हास्य और बातचीत में सुखपूर्वक प्रवृत्ति, दिन में किये भोजन का सायंकाल और रात्रि में किये भोजन का प्रातःकाल तक सुखपूर्वक जीर्ण हो जाना, बल, वर्ण, उपचय ( पुष्टि ) का शरीर से होना ये सब मात्रा में किये भोजन के लक्षण हैं ॥ ६ ॥ अमात्रावत्त्वं पुनर्द्विविधमाचक्षते । हीनमधिकं चेति । तत्रै हीन- मात्रमाहारराशिं बलवर्णोपचयक्षयकरमतृप्तिकरमुदावर्त्तकरमवृष्यम- नायुष्यमनौजस्यं शरीरमनोबुद्धीन्द्रियोपघातकरं सारविधमनमलक्ष्म्य- वहमशीतेश्च वातविकाराणामायतनमाचक्षते ॥ ७ ॥ अमात्रा-आहार की अमात्रा दो प्रकार की बतलाते हैं । ( १ ) हीन और ( २ ) अधिक । इन में आहार राशि की हीन मात्रा बल और वर्ण को पुष्ट नहीं करती, न मनुष्य को तृप्त करती है, वह उदावर्त्त-रोग को उत्पन्न करती है, आयु, वीर्य एवं ओज के लिये हितकारी नहीं है, मन, बुद्धि, इन्द्रिय ( आंख आदि ) को नष्ट करने वाली है । सार ( त्वग् रक्त आदि ) को नष्ट करती है । अलक्ष्मी ( गरीबी ) को पैदा करती है । हीनमात्रा अस्सी प्रकार के वायु रोगों का कारण होती है ऐसा वैद्य लोग बतलाते हैं ॥ ७ ॥ अतिमात्रं पुनः सर्वदोषप्रकोपणमिच्छन्ति सर्वकुशलाः ॥ ८ ॥ यो हि मूर्तानामाहारविकाराणां सौहित्यं गत्वा पश्चाद् द्रवैस्तृप्ति- मापद्यते भूयस्तस्याऽऽमाशयगता वातपित्तश्लेष्माणोऽभ्यवहारेणातिमात्रे- णातिप्रपीड्यमानाः सर्वे युगपत्प्रकोपमापद्यन्ते ॥ ६ ॥ ते प्रकुपितास्तमेवाऽऽहारराशिमपरिणतमाविश्य कुक्ष्यैकदेशमाश्रिता विष्टम्भयन्तः सहसा वाऽप्युत्तराधराभ्यां मार्गाभ्यां प्रच्यावयन्तः पृथक् पृथगिमान् विकारानभिनिर्वर्तयन्त्यतिमात्रभोक्तुः ॥ १० ॥ आहार राशि की अतिमात्रा से सब दोष प्रकुपित होते हैं, ऐसा कुशल चिकित्सक मानते हैं। जो मनुष्य मूर्त्त ( स्थूल ) आहार पदार्थों से पेट भर लेता है और ऊपर से पेय पदार्थों को पूर्णरूप से पी लेता है; उसके आमाशयमें स्थित वात, पित्त और कफ दोष इस अति अधिक भार से पीड़ित होकर साथ कुपित हो जाते हैं। वे प्रकुपित हुए दोष इस कच्ची ( अपरिपु