भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 517, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 517

अ० २ ] विमानस्थानम् ४६९ वह विरोधी रहता है। अर्थात् विष में शीतक्रिया और आम एवं अजीर्ण में उष्णक्रिया करनी अपेक्षित है, ये दोनों परस्पर विरोधी होती हैं ॥ १६ ॥ तत्र साध्यमामं प्रदुष्टमलसीभूतमुल्लेखयेदादौ पाययित्वा लवणमुष्णं च वारि । ततः स्वेदनवर्तिप्रणिधानाभ्यामुपाचरेदुपवासयेच्चैनम् ॥ १७ ॥ साध्य अलसक की चिकित्सा—दुष्ट हुए एवं अलस ( क्रियाहीन ) बने आम-दोष में लवण मिश्रित गरम पानी पिलाकर वमन कारक दोष को बाहर निकालना चाहिये । पीछे से स्वेदन ( फलवर्ति ) का उपयोग करे और रोगी को उपवास करावे ॥ १७ ॥ विसूचिकायां तु लङ्घनमेवाग्रे विरिक्तवच्चास्यानुपूर्वी ॥ १८ ॥ विसूचिका की अवस्था में सबसे प्रथम लंघन ही करवाना चाहिये । इसके पीछे विरेचन दिये पुरुष की भांति पेयादि की व्यवस्था ( उपकल्पनीय अध्याय [ सूत्र० अ० १५ ] में कहे अनुसार ) करनी चाहिये ॥ १८ ॥ आमप्रदोषेषु त्वन्नकाले जीर्णाहारं पुनर्दोषावलिप्तामाशयं स्तिमित- गुरुकोष्ठमनन्नाभिलाषिणमभिसमीक्ष्य पाययेद्दोषशेषपाचनार्थमौषधमग्नि- संधुक्षणार्थं च, न त्वेवाजीर्णाशनम् । आमप्रदोषदुर्बलो ह्यग्नियुगपद्दोष- मौषधमाहारजातं चाशक्तः पक्तुम्, अपि चाऽऽमप्रदोषाहारौषधविभ्र- मोऽतिबलवत्त्वादुपरतकायाग्निं सहसैवाऽऽतुरमबलमतिपातयेत् ॥१९॥ आम प्रदोष में औषध प्रयोग—जब भोजन जीर्ण हो गया हो, जिस का कोष्ठ जड़ और भारी हो, जो अन्न की इच्छा न करता हो, ऐसे पुरुष के शेष अपक्व दोषों के पाचन के लिये और उसके अग्नि को बढ़ाने के लिये भोजन के समय में औषध देनी चाहिये, किन्तु अजीर्ण अवस्था में भोजन के जीर्ण हुए बिना औषध नहीं देनी चाहिये । क्योंकि आम-प्रदोष के कारण दुर्बल हुई अग्नि आम दोष, औषध और भोजन इन सबको एक साथ पचाने में समर्थ नहीं होती । इसके अतिरिक्त आमदोष, आहार और औषध में परस्पर विषमता अधिक बलवान् होने से शरीर की अग्नि को नष्ट करके ये निर्बल रोगी को सहसा शीघ्र ही मार सकते हैं ॥१९॥ आमप्रदोषजानां पुनर्विकाराणामपतर्पणेनैवोपरमो भवति, सति त्वनुबन्धे कृतापतर्पणानां व्याधीनां निग्रहे निमित्तविपरीतमुपास्यौष- धं तद्विपरीतमेवावचारयेद्यथास्वम् । सर्वविकाराणामपि च निग्रहे विधिर्विपरीतमौषधमिच्छन्ति कुशलाः, तदर्थकारि वा ॥२०॥