चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 518, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें५०० चरकसंहिता [ अ० २ सम्पूर्ण आमदोषजन्य रोगों की शान्ति अपतर्पण ( उपवास ) से होती है१। संतर्पण से उत्पन्न रोगों में अपतर्पण क्रिया कारण के विपरीत है। परन्तु अप- तर्पण करने पर भी जहाँ अनुबन्ध हो वहां पर निदान के विपरीत औषध को छोड़ कर रोग के विपरीत ( जो जिस रोग के विपरीत हो ) वही औषध देनी चाहिये। यह बात केवल आमदोषजन्य रोगों के लिये ही नहीं है; अपितु सब रोगों के शमन के लिये निदान और रोग दोनों के विपरीत औषध देनी चाहिये ऐसा कुशल चिकित्सकों का मत है२ ॥ २० ॥ विशुद्धामप्रदोषस्य पुनः परिपक्वदोषस्य दीप्ते चाग्नावभ्यङ्गास्था- पनानुवासन विधिवत्स्नेहपानं च युक्त्या प्रयोज्यं प्रसमीक्ष्य दोष- भेषज·देश·काल·बल·शरीराहार·सात्म्य·सत्त्व·प्रकृति·वयसामवस्थान्त- राणि विकारांश्च सम्यगिति ॥२१॥ जब आम प्रदोष शान्त हो जाये, दोषों का परिपाक हो जाय, अग्नि प्रदीप्त हो जाय तब दोष, देश, औषध, काल, बल, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति और आयु आदि अवस्थाओ को तथा विकारों को भली प्रकार देखकर अभ्यंग, आस्थापन, अनुवासन आदि कर्म और विधिपूर्वक स्नेह-पान युक्ति से कराना चाहिये ॥२१॥ भवन्ति चात्र—अशितं खादितं पीतं लीढं च क्व विपच्यते । एतत्त्वां धीर ! पृच्छामस्तन्न आचक्ष्व बुद्धिमन् ! ॥२२॥ इत्यग्निवेशप्रमुखैः शिष्यैः पृष्टः पुनर्वसुः । आचचक्षे ततस्तेभ्यो यत्राऽऽहारो विपच्यते ॥ २३ ॥ नाभिस्तनान्तरं जन्तोरामाशय इति स्मृतः । अशितं खादितं पीतं लीढं चात्र विपच्यते ॥ २४ ॥ आमाशयगतः पाकमाहारः प्राप्य केवलम् । पक्वः सर्वाश्रयं पश्चाद्धमनीभिः प्रपद्यते ॥ २५ ॥ १. अपतर्पण दोष बल की अपेक्षा से तीन प्रकार का है । ( १ ) लंघन, ( २ ) लंघन·पाचन और ( ३ ) दोषावसेचन । अल्पदोष में लंघन, मध्य दोष में लंघन·पाचन और बहुदोष मे दोषावसेचन करना चाहिये । २. गुरु और स्निग्ध पदार्थों से उत्पन्न रोग में लघु रूक्ष चिकित्सा । स्नेह- स्वेदजन्य रोग में लंघन-बृंहण । वमन में और अधिक वमन कराना तदर्थकारी चिकित्सा है ।