भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 522, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 522

उदकं तु खल्वत्यर्थ-विकृत-गन्ध-वर्ण-रस-स्पर्श-क्लेदबहुलमपक्रान्त- जलचरविहङ्गममुपक्षीणजलाशयमप्रीतिकरमपगतगुणं विद्यात् ॥ ८ ॥ जल—जिस पानी का गन्ध, रस, वर्ण और स्पर्श बहुत अधिक विकृत हो गया हो, जिस में क्लेद (सडांद) बहुत उठे, जिस पानी को जलचारी पक्षी छोड़कर चले गये हों, जिस पानी में रहने वाली मछलियां नष्ट हो गई हों और जलाशय भी कमती हो गया हो, इस प्रकार के पानी को अप्रिय और गुणरहित जाने ॥८॥ देशं पुनर्विंकृत-वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्श-क्लेद-बहुलमुपसृष्टं सरीसृप-व्याल- मशक-शलभ-मक्षिका-मूषकोलूक-श्मशानिक-शकुनि-जम्बुकादिभिरूष्णो- तृणोपवनवन्तं लताप्रतानादिबहुलमपूर्ववदवपतितं शुष्कनष्टशस्यं धूम्रप- वनं प्रभातपतत्रिगणमुत्कृष्टश्वगणमुद्भ्रान्त-व्यथित-विविध-मृग-पक्षि- सङ्घमुत्सृष्ट-नष्ट-धर्म-सत्य-लज्जाचार-शील-गुण-जनपदं शश्वत्क्षुभितो- दीर्णसलिलाशयं प्रतताल्कापातनिर्घातभूमिकम्पमतिभयाराबरूपं रूक्ष- ताम्रारुणसिताभ्र-जाल-संवृतार्क-चन्द्र-तारकमभीक्ष्णं ससंभ्रमोद्वेगमिव सत्रासरुदितमिव सतमस्कमिव गुह्यकाचरितमिवाऽऽक्रन्दितशब्दबहु- लमिव चाहितं विद्यात् ॥ ६ ॥ देश—जिस स्थान का वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श विकृत हो गया हो, क्लेद बहुल हो, जिस स्थान में सरीसृप (सरकने वाले सांप आदि जन्तु), व्याल (सिंह, चीते आदि), मशक (मच्छर) शलभ (पतंगे), मक्खियां मूषक (चूहे), उलूक (उल्लू), श्मशान में रहने वाले पक्षी गीध, चील, गीदड़ आदि का उपद्रव हो, जहां पर ये बहुत हों, जहां पर तृण, घास, लता आदि बहुत हों, जो पहिले से एकदम नया ही दीखे, जहां पर अनाज के खेत सूख या नष्ट हो गये हों, जहां की वायु धुंवाली हों, जहां पर पक्षीगण घोर शब्द करते हों, जहां पर कुत्ते मुंह उठा कर रोते हों, जहां पर घबराये और पीड़ित नाना प्रकार के मृग-पशु-पक्षीसमूह हों, जिन नगरों में से धर्म, सत्य, लज्जा, आचार, शील, दया, दाक्षिण्य आदि गुण नष्ट हो गये हों, जहाँ के तालाबों का पानी बिना वायु के भी निरन्तर क्षुभित और तरंगों वाला रहे, जहां पर उल्कापात, बिजली आदि का गिरना, भूकम्प आदि लगातार हों और भयंकर शब्द उत्पन्न होता हो, जहां पर सूर्य, चन्द्र और तारे रूखे, तांबे के से, लाल, काले, बादलों से ढंपे दिखाई देवे, जहां पर बार बार भ्रम, उद्वेग, के साथ, भय के साथ रोने का सा शब्द सुने, अन्धकार सा हो, जो गुह्यक (यक्ष) आदि देवयोनियों से आक्रान्त सा हो, तथा रोने के से शब्दों से व्याप्त हो देश को अनारोग्यकारक समझना चाहिये ॥ ६ ॥