चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 523, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] विमानस्थानम् ५०५ कालं तु खलु यथर्तुलिङ्गाद्विपरीतलिङ्गमधिकलिङ्गं हीनलिङ्गं वाहितं व्यवस्येत् ॥ १० ॥ काल—शीत, उष्ण और वर्षा इन ऋतुओं के अपने लक्षणों से विपरीत होना या उन लक्षणों का अधिक होना या कम होना ( मिथ्यायोग, अतियोग और अयोग ) अनारोग्यकारक होता है ॥ १० ॥ इमानेवं दोषयुक्तांश्चतुरो भावान् जनपदोद्ध्वंसकरान् वदन्ति कुशलाः । अतोऽन्यथाभूतांस्तु हितानाचक्षते ॥ ११ ॥ विगुणेष्वपि तु खल्वेतेषु जनपदोद्ध्वंसनकरेषु भेषजेनोपपाद्यमा- नानामभयं भवति रोगेभ्य इति ॥ १२ ॥ निपुण वैद्य इस प्रकार के दोषों वाले वायु, जल, देश और काल इन चारों को जनपद-नाश का कारण मानते हैं । इनसे विपरीत लक्षणों वाले इन चारों को आरोग्यकारक गिनते हैं । इन चारों के विगुण होने व जनपद के नाशक कारणों के उपस्थित होने पर भी, दोष और दूष्य की अपेक्षा करके औषध द्वारा चिकित्सा करने पर पुरुषों को रोग नहीं होते, वे पुरुष रोगों से बचे रहते हैं ॥ ११-१२ ॥ भवन्ति चात्र—वैगुण्यमुपपन्नानां देशकालानिलाम्भसाम् । गरीयस्त्वं विशेषेण हेतुमत्संप्रचक्ष्यते ॥ १३ ॥ वाताज्जलं जलाद्देशं, देशात्कालं, स्वभावतः । विद्याद् दुष्परिहार्यत्वाद् गरीयस्तरमर्थवित् ॥ १४ ॥ वाय्वादिषु यथोक्तानां दोषाणां तु विशेषवित् । प्रतीकारस्य सौकर्ये विद्याल्लाघवलक्षणम् ॥ १५ ॥ विकृत हुए देश, काल, वायु, और जल इनमें कारण के विचार-अनुसार- किसका उत्कर्ष है इसका वर्णन करते हैं । यथार्थ तत्त्व को जानने वाला वैद्य स्वभाव से वायु से जल को, जल से देश को, देश से काल को बढ़ कर समझे । क्योंकि इनका त्याग नहीं किया जा सकता । यदि वायु खराब हो तो दूसरे स्थान पर सुगमता से जाया जा सकता है । जल तो जीवन के लिये सेवन करना आवश्यक है । यदि प्रयत्न से जल को भी छोड़ दें, देश से बचना कठिन है । देश से भी यदि देशान्तर में जायें तो काल से बचना अशक्य है । इसलिये सबसे अधिक प्रबल काल है । वायु, जल, देश और काल इन चारों के दोषों को दूर करने के उपाय जाने और दोषों के प्रतिकार के सुगम होने के कारक वैद्य इनके शान्ति के लक्षण भी जाने ॥ १३-१५ ॥