भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 527, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 527

अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०९ रोग आदि की उत्पत्ति का मूल कारण—पहले भी अधर्म के बिना किसी अन्य कारण से रोग आदि अशुभों की उत्पत्ति नहीं हुई । कृतयुग में देवों के समान तेज-पराक्रम वाले, अति बलवान्, विशाल प्रभाव वाले, देव, देवर्षि, धर्म, यज्ञ विधि आदि सत्कर्मों को प्रत्यक्ष देखने वाले, पर्वत के समान दृढ, संगठित, स्थिर शरीर वाले, निर्मल वर्ण ( कान्ति ), और इन्द्रियों से युक्त, वायु के समान बल, वेग और पराक्रमवाले, सुन्दर नितम्बवाले, वायु के अनुकूल अवयव परिमाण, आकृति और प्रसादवाले और गुणों और पुष्टि से युक्त, सत्य, आर्जव ( ऋजुता, नम्रता ), अनृशंसता ( दया ), दम, दान, नियम, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य और व्रतो में तत्पर, भय, राग, द्वेष, मोह, लोभ, क्रोध, शोक, मान, रोग, निद्रा, तन्द्रा, श्रम, क्लम, आलस्य, परिग्रह इन से रहित और अमित ( युगों के अनुसार दीर्घ ) आयु वाले पुरुष थे । सत्य युग के प्रारम्भ मे इन पुरुषों के उदारचित्त और गुणों, धार्मिक कर्मों के अचिन्त्य प्रभाव से पृथिवी आदि महाभूतो के सर्वगुणसम्पन्न होने से शस्य ( धान्य ) भी रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव और गुणों वाले उत्पन्न होते थे । भ्रश्यति तु कृतयुगे केषांचिदत्यादानात्सांप्रतिकानां शरीरगौरव- मासीत् । शरीरगौरवात् श्रमः श्रमादालस्यं, आलस्यात् संचयः, संच- यात् परिग्रहः, परिग्रहाल्लोभः प्रादुर्भूतः कृते ॥२८॥ कृतयुग के उतरते हुए अन्तिम भाग से कुछ सम्पन्न धनो लोंगों के अति- भोजन से शरीर में भारीपन आ गया । शरीर में भारीपन आने से श्रम, श्रम से आलस्य, आलस्य से संचय ( इकट्ठा करने की बुद्धि ), संचय से परिग्रह ( ममता ) और परिग्रह से लोभ उत्पन्न हुआ ॥ २८ ॥ ततस्त्रेतायां लोभादभिद्रोहः, अभिद्रोहादनृतवचनं, अनृतवचनात्काम- क्रोध-मान-द्वेष-पारुष्याभिघात-भय-ताप-शोक-चित्तोद्वेगादयः प्रवृत्ताः । ततस्त्रेतायां धर्मपादोऽन्तर्धानमगमत्, तस्यान्तर्धानात् ( युगवर्षप्रमा- णस्य पादह्रासः ) पृथिव्यादीनां गुणपादप्रणाशोऽभूत्, तत्प्रणाशकृतश्च सस्यानां स्नेह-वैमल्य-रस-वीर्य-विपाक-प्रभाव-गुण-पाद-भ्रंशः । तत स्तानि प्रजाशरीराणि हीयमानगुणपादैश्चाऽऽहारविहारैर्यथापूर्वमुपष्ट- भ्यमानान्यग्निमारुतपरीवानि प्राग्यथाधिभिर्ज्वरादिभिराक्रान्तानि, अतः प्राणिनो ह्रासमवापुरायुषः क्रमश इति ॥ २९ ॥ फिर त्रेता में लोभ से अभिद्रोह, अभिद्रोह से असत्य भाषण, असत्य भाषण काम, क्रोध, मान, द्वेष, कठोर वचन, अभिघात ( परस्पर हिंसा ), भय,