चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५१० चरकसंहिता [ अ० ३ ताप, शोक, चिन्ता, उद्वेग आदि उत्पन्न हुए। इन के पीछे त्रेता में धर्म का एक चरण लोप हो गया। इस धर्म के एक पांव के लोप होने से आहार- विहार के गुणों का भी एक चतुर्थांश नष्ट हो गया। साथ में पृथिवी आदि के गुणों में भी एक चौथाई कमी आ गई। इस कमी के कारण धान्यों के स्नेह, निर्मलता, रस, वीर्य, विपाक, प्रभाव में भी चतुर्थांश घटती हो गई। इस से पुरुषों के शरीर के गुणों में चतुर्थांश की कमी होने से, आहार विहार के गुणों में भी घटती होने से, पूर्व युग के समान वे अग्नि, वायु वाले नहीं रहे। अग्नि, वायु के गुणों में भी कमी आ गई। इसलिये ज्वर आदि रोगों से प्रथम प्रथम आक्रान्त हुए। अतः कृतयुग से प्राणियों की आयु में एक एक चतुर्थांश की कमी हुई ॥ २९ ॥ भवतश्चात्र—युगे युगे धर्मपादः क्रमेणानेन हीयते । गुणापादश्च भूतानामेवं लोकः प्रलीयते ॥ ३० ॥ संवत्सरशते पूर्णे याति संवत्सरः क्षयम् । देहिनामायुषः काले यत्र यन्मानमिष्यते ॥ ३१ ॥ इति विकाराणां प्रागुत्पत्तिहेतुरुक्तो भवति । इस क्रम से प्रत्येक युग में धर्म का एक एक पाद (चतुर्थांश) क्षीण होता जाता है। इसी क्रम से पृथिवी आदि भूतों के गुणों में भी एक एक पाद की कमी होती जाती है। अर्थात् सत्य युग में चार पाद, त्रेता में तीन पाद, द्वापर में दो और कलियुग में एक पाद शेष रह जाता है। इस प्रकार से लोक प्रलय को प्राप्त होते हैं। जिस युग में मनुष्यों की आयु और युग का जो जो परिमाण है, उस युगमान के सौ वर्ष पूर्ण होने पर आयु का एक एक वर्ष कम हो जाता है। जैसे कलियुग में सौ वर्ष की आयु है। युगमान १०० वर्ष पूर्ण होने पर एक वर्ष कम होकर निन्यानवें (९९) वर्ष परमायु होती है। यह रोगों के प्रथम उत्पत्ति का कारण कह दिया ॥ ३१ ॥ एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—किं नु खलु भगवन् ! नियतकालप्रमाणमायुः सर्वं न वेति ॥ ३२ ॥ इस प्रकार कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने पूछा—भगवन् ! क्या आयु का समय और परिमाण सब निश्चित है या अनिश्चित ? ॥ ३२ ॥ भगवानुवाच—इहाग्निवेश ! भूतानामायुर्युक्तिमपेक्षते !॥ ३३ ॥ दैवे पुरुषकारे च स्थितं ह्यस्य बलाबलम् ।