चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 529, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ ] विमानस्थानम् ५११ भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश ! प्राणियों की आयु, दैव और पुरुषकार इन दोनों का योग चाहती है। इसलिये आयु का बल और अबल दैव और पुरुषार्थ पर स्थित है ॥ ३३ ॥ दैवमात्मकृतं विद्यात्कर्म यत्पौर्वदैहिकम् ॥ ३४ ॥ स्मृतः पुरुषकारस्तु क्रियते यदिहापरम् । बलाबलविशेषोऽस्ति तयोरपि च कर्मणोः ॥ ३५ ॥ अपने शरीर से जो कर्म पूर्व जन्म में किये हों उन को 'दैव' जाने। और इस जन्म में जो कर्म किया जाता है उसे पुरुषकार कहा है। इन दोनों प्रकार के कर्मों का विशेष बल और अबल होता है ॥ ३४-३५ ॥ दृष्टं हि त्रिविधं कर्म हीनं मध्यममुत्तमम् । यह कर्म भी तीन प्रकार का है। हीन, मध्यम और उत्तम । तयोरुदारयोर्युक्तिर्दीर्घस्य च सुखस्य च ॥ ३६ ॥ नियतस्याऽऽयुषो हेतुर्विपरीतस्य चेतरा । तीन प्रकार की आयु—दैव और पुरुषकार दोनों प्रकार के कर्म उत्तम होने से आयु का परिमाण अर्थात् नियत काल दीर्घ होता है। सुखकारक एवं हितकारक आयु मिलती है और यदि इन दोनों प्रकार के कर्मों में विपरीत युक्ति हो तो आयु अनियत, छोटी, दुःखी एवं अहितकारक रहती है ॥ ३६ ॥ मध्यमा मध्यमस्येष्टा,कारणं शृणु चापरम् ॥ ३७ ॥ दैवं पुरुषकारेण दुर्बलं ह्यपहन्यते । दैवेन चेतरत्कर्म विशिष्टेनोपहन्यते ॥ ३८ ॥ इन कर्मों में मध्यम बल हो तो आयु भी मध्यम प्रकार की रहती है। और भी कारण सुनो। जहां पर एक कर्म बलवान् हो, दूसरा निर्बल हो, वहां पर बलवान् दुर्बल कारण को दबा लेता है। इसलिये यदि पुरुषकार-कर्म बलवान् होगा तो निर्बल दैव को दबा लेगा और यदि दैव बलवान् होगा तो वह दूसरे कर्म (पुरुषकार) को नष्ट कर देगा। निर्बल को बलवान् दबा लेता है ॥३८॥ दृष्ट्वा यदेके मन्यन्ते नियतं मानमायुषः । कर्म किंचित् क्वचित्काले विपाके नियतं महत् । किंचित्त्वकालनियतं प्रत्ययैः प्रतिबोध्यते ॥ ३६ ॥ इस बात को देख कर कुछ विद्वान् आयु का परिमाण निश्चित मानते हैं । किसी बलवान् कर्म का तो किसी विशेष निश्चित समय में ही परिपाक होता है और किसी का विपाक काल अनिश्चित है, कभी भी उसका पाक हो सकता है ।