चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 54, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ चरकसंहिता [ अ० २ सिद्ध की हुई यवागू वात का अनुलोमन अर्थात् कफ वातादि दोषों का परिपाक करके मल को अच्छी प्रकार से बाहर करती है ॥ २६ ॥ तक्रसिद्धा यवागूः स्याद् घृतव्यापत्तिनाशिनी। तैलव्यापदि शस्ता तु तक्रपिण्याकसाधिता ॥ ३० ॥ (२१) छाछ में सिद्ध की हुई यवागू घी के अधिक खाने से उत्पन्न विकार को नष्ट करती है । (२२) छाछ और पिण्याक (खल) से सिद्ध की हुई यवागू तैल के अधिक खाने से उत्पन्न व्याधि में देने योग्य है ॥ ३० ॥ गव्यमांसरसैः साम्ला विषमज्वरनाशिनी । कण्ठ्या यवानां यमके पिप्पल्यामलकैः शृता ॥ ३१ ॥ (२३) गाय के मांस के रस में सिद्ध की हुई यवागू को अनार, आंवला आदि ज्वर नाशक खटाई से खट्टा करके देने पर विषम ज्वर नष्ट होता है । (२४) जौ को समान भाग लेकर घी और तैल में भूनकर पिप्पली और आंवले इनके कषाय या कल्क से सिद्ध की हुई यवागू कण्ठ के रोगों के लिये हितकर है ॥ ३१ ॥ ताम्रचूड़रसे सिद्धा रेतोमार्गरुजापहा । समाषत्रिदला वृष्या घृतक्षीरोपसाधिता ॥ ३२ ॥ (२५) 'ताम्रचूड़' अर्थात् कुक्कुट के मांस के रस में सिद्ध की हुई यवागू शुक्र मार्ग की पीड़ा को मिटाती है। (२६) जल के स्थान पर दूध और घृत यथापरिमाण में लेकर उनमें उड़द की दाल या इसकी पिसी हुई पिट्ठी को पहिले घी में भूनकर दूध में यवागू सिद्ध करनी चाहिये । यह शुक्रवर्धक है ॥ ३२ ॥ उपोदिकादधिभ्यां तु सिद्धा मदविनाशिनी । क्षुधं हन्यादपामार्गक्षीरगोधारसै शृता ॥ ३३ ॥ (२७) उपोदिका अर्थात् पोई को कल्क रूप में तथा दही को पानी के स्थान में लेकर यवागू सिद्ध करनी चाहिये । यह यवागू धतूरे आदि के विष को नष्ट करती है । पोई और दही से सिद्ध की यवागू मद नाशक है । (२८) चिरचिटे के चावलों को दूध और गोह के मांस में पकाकर यवागू सिद्ध करे । इस से भूख का नाश होता है। यहां पर जल वा सादे चावल नहीं प्रयुक्त होते ॥ ३३ ॥