चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३ सूत्रस्थानम् ३७ उपसंहार— तत्र श्लोकाः । अष्टाविंशतिरित्येता यवाग्वः परिकीर्तिताः । पञ्चकर्माणि चाश्रित्य प्रोक्ता भैषज्यसंग्रहः ॥ ३४ । पूर्वं मूलफलज्ञानहेतोरुक्तं यदौषधम् । पञ्चकर्माश्रयज्ञानहेतोस्तत्कीर्तितं पुनः ॥ ३५ ॥ इस अध्याय में अट्ठाईस प्रकार की यवागू कह दी हैं और पंच कर्म (वमन, विरेचन, नस्य, आस्थापन और अनुवासन) इन के योग्य ओषधियां भी कह दी हैं। मूलिनी, फलनी आदि का ज्ञान कराने के लिये जो औषधियां प्रथम अध्याय में कही हैं, वे औषधियां पंचकर्मों में आद्य व्याधियों में उपयुक्त हैं, इसलिये यहां पर फिर लिखी हैं ॥ ३४-३५ ॥ स्मृतिमान् युक्तिहेतुज्ञो जितात्मा प्रतिपत्तिमान् । भिषगौषधसंयोगैश्चिकित्सां कर्तुमर्हति ॥ ३६ ॥ (स्मृतिमान्) स्मरण शक्ति वाला, (हेतुज्ञ) रोग के कारण का जानने वाला, (युक्तिज्ञ) योजना, व्याधि के साधन रूप भैषज्य की कल्पना को जानने वाला, अथवा मात्रा की भांति द्रव्य, व्याधि बल और व्याधि रूप को जानने वाला, (जितात्मा) भ्रम-प्रमाद रहित, (प्रतिपत्तिमान्) उत्तम सूझ वाला, वैद्य औषधियों के योग से उपचार करने में समर्थ हो सकता है ॥ ३६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने सभाषाभाष्ये भेषज- चतुष्केऽपामार्गतण्डुलीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ अथ तृतीयोऽध्यायः । अथात आरग्वधीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ रोगों की हितकामना से यवागू कहकर उसी प्रसंग में प्रदेह चूर्ण आदि कहते हैं। इसके लिये 'आरग्वधीय' नामक तीसरे अध्याय का व्याख्यान करते हैं ऐसा भगवान् आत्रेय कहते हैं। इस अध्याय का आरम्भ 'आरग्वध' से हुआ है, इसलिये इस अध्याय का नाम आरग्वधीय है ॥१-२॥