भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 639 में से

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पृष्ठ 553

प्रायः वात आदि शारीरिक दोषों के एक स्थान में रहने से परस्पर मेल हो जाता है। तीनों दोषों के मिलने से सन्निपात और दो दोषों के मिलने से संसर्ग होता है। कारण की भिन्नता होने पर भी इन में जो परस्पर संसर्ग होता है वह इसलिये होता है कि दोष दूषित करने वाले कारणों के समान गुण वाले हैं। अर्थात् दोषों में दूषित करने वाले कारणों के समान गुण हैं ॥ ७ ॥ तत्रानुबन्ध्याद्यनुबन्धविशेषः, -स्वतन्त्रो व्यक्तलिङ्गो यथोक्तसमुत्थान- प्रशमो भवत्यनुबन्ध्यः, तद्विपरीतलक्षणस्त्वनुबन्धः। १अनुबन्ध्य- (अनुबन्ध) लक्षणसमन्वितास्तत्र यदि दोषा भवन्ति तत् त्रिकं संनि- पातमाचक्षते, द्वयं वा संसर्गम् । अनुबन्ध-२विशेषकृतस्तु बहुविधो दोषभेदः। एवमेष संज्ञाप्रकृतो भिषजां दोषेषु चैव व्याधिषु च नाना- प्रकृतिविशेष्यूहः ॥ ८ ॥ अधिष्ठान (आश्रय) और निदान की समानता होने पर भी अनुबन्ध्य और अनुबन्ध के कारण इन में भेद होता है। अनुबन्ध्य का लक्षण - जो स्वतन्त्र (स्वतः प्रधान), स्पष्ट लक्षणोंवाला, अपने ही कारण से उत्पन्न होने वाला तथा अपनी ही चिकित्सा से शान्त होने वाला हो, उसको अनुबन्ध्य कहते हैं। इस के विपरीत लक्षणोंवाला (परतंत्र, अस्पष्ट चिह्न, पृथक् निदान एवं चिकित्सा वाला) अनुबन्ध होता है। यदि अनुबन्ध्य के रूप से तीनों दोष मिले हों तो इसे सन्निपात और दो दोष मिले हों तो इस को 'संसर्ग' कहते हैं। अनुबन्ध के रूप में मिले हुए दोषों के बहुत भेद हो जाते हैं। इस प्रकार से दोषों में (अनुबन्ध्य और अनुबन्ध के भेद से) और रोगों से (प्रकोपन आदि के भेद से) वैद्योंने (सन्निपात, संसर्गादि से ज्वर अतिसार आदि) नाना प्रकार की संज्ञाएं की हैं ॥ ८ ॥ अग्निषु तु शारीरेषु चतुर्विधो बलभेदेन भवति। तद्यथा-तीक्ष्णो मन्दः समा विषम इति। तत्र तीक्ष्णोऽग्निः सर्वापचारसहः तद्विपरी- तलक्षणो मन्दः। समस्तु खल्वपचारतो विकृतिमापद्यतेऽनपचारतस्तु प्रकृताववतिष्ठते, समलक्षणविपरीतलक्षणस्तु विषमः । इत्येते चतुर्विधा भवन्त्यग्नयश्चतुर्विधानामेव पुरुषाणाम् ॥ ६ ॥ बल के भेद के कारण शरीरस्थ अग्नि चार प्रकार का है। जैसे-तीक्ष्ण मन्द, सम और विषम। इन में तीक्ष्ण अग्नि सब प्रकार के अपचारों को सहन करता है। वह विषम आहार को भी शीघ्र जीर्ण कर देता है। तीक्ष्ण अग्नि से विपरीत लक्षणों वाले अग्नि को मन्द-अग्नि कहते हैं। सम अग्नि यथासमय १ 'अनुबन्ध्य लक्षण सम०', २. 'अनुबन्ध्यानुबन्धविशेष०' इति च पाठ भेदो।

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