भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 554

५३६ चरकसंहिता [ अ० ६ भुक्त अन्न को भली प्रकार पचाता है । यह अग्नि अपचार से विकृति को प्राप्त होता है । अनपचार से प्रकृति में ही रहता है । सम अग्नि के विपरीत लक्षणों वाले अग्नि को 'विषम' अग्नि कहते हैं ॥ ६ ॥ तत्र समवातपित्तश्लेष्मणां प्रकृतिस्थानां समा भवन्त्यग्नयः, वात- लानां तु वाताभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने विषमा भवन्त्यग्नयः, पित्तलानां तु पित्ताभिभूतेऽग्न्यधिष्ठाने तीक्ष्णा भवन्त्यग्नयः, श्लेष्मलानां तु श्लेष्मा- भिभूते ह्यग्न्यधिष्ठाने मन्दा भवन्त्यग्नयः ॥ १० ॥ ये चार प्रकार के अग्नि चार प्रकार के पुरुषों में होते हैं । जैसे—सम-वात पित्त-कफ-प्रकृति-वाले पुरुषों में दोषों के समानावस्था में स्थित होने से अग्नि भी सम रहता है । वातप्रकृति वाले पुरुषों में अग्नि के आश्रय स्थान (ग्रहणी) के वायु से आक्रान्त होने के कारण अग्नि भी विषम रहता है । पित्तप्रकृति के पुरुषों में अग्नि के अधिष्ठान (ग्रहणी) के पित्त से आक्रान्त होने के कारण अग्नि भी तीक्ष्ण रहता है । कफप्रकृति के पुरुषों में अग्नि के आश्रय स्थान (ग्रहणी) के कफ से आक्रान्त होने के कारण अग्नि भी मन्द रहता है ॥ १० ॥ तत्र केचिदाहुः—न समवातपित्तश्लेष्माणो जन्तवः सन्ति, विष- माहारोपयोगित्वान्मनुष्याणाम् । तस्माच्च वातप्रकृतयः केचित् केचित्पि- त्तप्रकृतयः, केचिःपुनः श्लेष्मप्रकृतयो भवन्तीति । इस पर कुछ आचार्यों का कथन है कि समवात-पित्त-कफ प्रकृति वाले पुरुष नहीं होते । क्योंकि मनुष्यों का आहार विषम होता है । गर्भ में ही प्रकृति बनती है । इसलिये (माता के आहार की विषमता से भी) कोई वात- प्रकृति, कोई पित्तप्रकृति और कोई कफप्रकृति होते हैं । तच्चानुपपन्नम् । कस्मात्कारणात् ? समवातपित्तश्लेष्माणं हारोगमि- च्छन्ति भिषजः । यतः प्रकृतिश्चाऽऽरोग्यं, आरोग्यार्था च भेषजप्रवृत्तिः, सा चेष्टरूपा, तस्मात्सन्ति समवातपित्तश्लेष्माणः । न तु खलु सन्ति वातप्रकृतयः पित्तप्रकृतयः श्लेष्मप्रकृतयो वा । तस्य तस्य किल दोष- स्य ह्यधिकभावात्सा सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणाम् । न च विकृतेषु दोषेषु प्रकृतिस्थत्वमुपपद्यते । तस्मान्नैताः प्रकृतयः सन्ति । सन्ति तु खलु वातलाः पित्तलाः श्लेष्मलाश्च । अप्रकृतिस्थास्तु ते ज्ञेयाः ॥ ११ ॥ उनका ऐसा कथन ठीक नहीं हैं, क्योंकि वैद्य लोग वात, पित्त, कफ इन तीनों की समान अवस्था वाले को ही नीरोग (रोग-रहित) कहते हैं और उसी को प्रकृति मानते हैं । रोगों से रहित रहने के लिये ही औषध की ओर मनुष्य की प्रवृत्ति है और यह सब को इष्ट है । यह अभिवाञ्छित अर्थ ही प्रवृत्ति में