चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 557, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंणमुरसा क्षणे क्षणे चाम्रथ-चन्दन-प्रियङ्गु-कालीय-मृणाल-शीतवात-वारि- भिरुत्पल-कुमुद-कोकनद-सोगन्धिक-पद्मानुगतैश्च वारिभिरभिप्रोक्षणं, श्रुति-सुख-मृदुमधुर-मनोनुगानां च गीतवादित्राणां श्रवणं, श्रवणं चाभ्यु- दयानां, सुहृद्भिश्च संयोगः, संयोगश्चेष्टाभिः स्त्रीभिः शीतोपहितांशुक्र- स्रग्दामहारधारिणीभिनिशाकरांशु-शीतल-प्रवात-हर्म्यवासः, शैलान्तर- पुलिन-शिशिरसदन-व्यजन-पवनानां सेवा, रम्याणां चोपवनानां सेवा, सुख-शिशिर-सुरभि-मारुतोपवानानामुपसेवनं, सेवनं च नलि- नोत्पल-पद्म-कुमुद-सौगन्धिक-पुण्डरीक-शतपत्र-रम्यतां सौम्यानां च सर्वभावानामिति॥ १५॥ पित्त-प्रकृति का मनुष्य जब पित्त-प्रकोपक वस्तुओं का सेवन करता है उस समय पित्त शीघ्र कुपित होजाता है, शेष अन्य दो धातु इतनी जल्दी कुपित नहीं होते। तब इस पुरुष के पूर्वोक्त चालीस पित्तजन्य रोगों से शरीर आक्रान्त हो जाता है, जिससे उसके बल, वर्ण, सुख और आयु का नाश होता है। इस पित्त को शान्त करने के लिये घी का सेवन करना श्रेयस्कर है। शोधन के लिये घी से स्नेहन (तेलादि से नहीं), अधोदपहरण अर्थात् विरेचन का देना, मधुर, तिक्त, कषाय, और शीत ओषधियों से युक्त खान-पान का उपयोग, मृदु- मधुर, सुगन्धित, शीतल और हृदय को प्रिय लगने वाले गन्धों (सुगन्धों) का सेवन, अति ठण्डे पानी में रक्खे मोती, मणियों की मालाओं को छाती पर धारण करना, थोड़ी देर में श्वेत चन्दन, प्रियंगु, कालीयक, (चन्दन का भेद) मृणाल, शीतल वायु, शीतल पानी, उत्पल, कुमुद, कोकनद, सौगन्धिक और पद्म (ये सब कमल के भेद हैं) इनसे हाथ-पांव धोना या छींटे डालना, कान के लिये प्रिय, मृदु, मधुर एवं मन के अनुकूल गाना-बजाना सुनना, उत्सव (नाच-रंग) आदि देखना, मित्रों से मिलना शीतल द्रव्यों से लिप्त वस्त्र, माला, और हारों को धारण की हुई अभिलषित स्त्रियों से मिलना-जुलना, चन्द्रमा की शीतल किरणों से शीतल खुली वायु मे, महल की छतों पर ठंडे, पहाड़ों के बीच में, नदियों के तटों पर, ठंडे घरों (धारागृहों) में, ठण्डे पंखों की शीतल वायु का सेवन, सुखस्पर्श, शिशिर, सुगन्धित वायु से युक्त रम्य उपबनों का सेवन करना, पद्म, उत्पल, नलिन, कुमुद, सौगन्धिक, पुण्ड- रीक, शतपत्र इन नाना प्रकार के कमलों से भरे तालाबों का सेवन और अन्य सब सौम्य शीतल वस्तुओं का सेवन करना पित्त को शान्त करता है ॥ १५ ॥ श्लेष्मलस्यापि श्लेष्मप्रकोपणोकान्यासेवमानस्य क्षिप्रं श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते, न तथेतरौ दोषौ। स तस्य प्रकोपमापन्नो यथोक्तै-