भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 558, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 558

५४० चरकसंहिता [ अ० ६ विकारैः शरीरमुपतपति बलवर्णसुखायुषामुपघाताय । तस्यावजयनं— विधियुक्तानि तीक्ष्णोष्णानि संशोधनानि, रूक्षप्रायाणि चाभ्यवहा- र्याणि कटु-तिक्त-कषायोपहितानि, तथैव धावन-लंघन-प्लवन-परिसरण- जागरणानि युद्ध-व्यवाय-व्यायामोन्मर्दन-स्नानोत्साधनानि, विशेषत- स्तीक्ष्णानां दीर्घकालस्थितानां मद्यानामुपयोगः, सधूमपानः सर्वशश्चो- पवासः, तथोष्णवासः सुखप्रतिषेधश्च सुखार्थमेवेति ॥ १६ ॥ कफप्रकृति के मनुष्य का कफ प्रकोपक वस्तुओं को सेवन करने से शीघ्र प्रकुपित हो जाता है, शेष अन्य दोनों धातु इतनी जल्दी कुपित नहीं होते । कुपित कफ पूर्वोक्त बीस प्रकार के कफ-रोगों से शरीर को पीड़ित करता है, जिससे उसके बल, वर्ण सुख और आयु का ह्रास होता है । इस कफ को शमन करने के लिये शास्त्रोक्त विधि से तीक्ष्ण-उष्ण संशोधन और संशमन, रूक्ष गुण- वाले कटु, तिक्त, कषाय रस युक्त आहार-द्रव्य प्रयोग करने चाहियें । इसी प्रकार भागना, उपवास (लंघन), प्लवन (कूदना या पानी में तैरना), परिसरण (परिक्रमण, चारों ओर घूमना), रात्रि में जागना युद्ध व्यायाम (शरीर को परिश्रम देने वाला कर्म, कुश्ती आदि), उन्मर्दन (रूक्ष मालिश), स्नान, उत्सादन (उबटन लगाना), खासकर तीक्ष्ण और पुराने मद्य का उपयोग, और धूमपान करना, सब प्रकार से उपवास, गरम वस्त्रों का उप- योग, और सुख (आराम) का परित्याग, दुःख सहना, सुख प्राप्ति के लिये सेवन करना चाहिये ॥१६॥ भवति चात्र—सर्व्ररोगविशेषज्ञः सर्वकार्यविशेषवित् । सर्वभेषजतत्त्वज्ञो राज्ञः प्राणपतिर्भवेत् ॥ १७ ॥ सब रोगों में (दोष, अग्नि, वात आदि को) जानने वाला, सब कार्यों के अनुष्ठान को भली प्रकार जानने वाला, सब औषधियों के तत्त्व (सार) का समझने वाला वैद्य राजा का प्राणपति (प्राणों का पालक) होगा ॥ १७ ॥ तत्र श्लोकाः—प्रकृत्यन्तरभेदेन रोगानीकविकल्पनम् । परस्पराविरोधश्च सामान्यं रोगदोषयोः ॥ १८ ॥ दोषसंख्याविकाराणामेकदोषप्रकोपणम् । ज्वरणं प्रतिचिन्ता च कायाग्नेर्धुक्षणानि च ॥ १९ ॥ नराणां वातलादीनां प्रकृतिस्थापनानि च । रोगानीके विमानेऽस्मिन् व्याहृतानि महर्षिणा ॥ २० ॥ प्रकृति (प्रभाव आदि) भेद से, रोगों के भेद, नानाविध संख्या होने पर भी परस्पर अविरोध, रोग और दोष में समानता, दोषों की संख्या, रोगों का