चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 560, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें५४० चरकसंहिता [ अ० ७ परिस्र्वलन्ति, विदितवेदितव्यास्तु भिषजः सर्वं सर्वथा यथासंभवं परीक्ष्य परीक्ष्याध्यवस्यन्तो न कचिदपि विप्रतिपद्यन्ते, यथेष्टमर्थमभि- निर्वर्तयन्ति चेति ॥ ४ ॥ क्योंकि ज्ञान के एक देश (भाग) से सम्पूर्ण ज्ञेयवस्तु का ज्ञान नहीं हो सकता। इस प्रकार से रोग-ज्ञान में धोखा खाने पर चिकित्सा-युक्ति ज्ञान में भी धोखा खाजाते हैं। जिस समय ये अकुशल वैद्य गुरु-व्याधि से पीड़ित मनुष्य को लघु-व्याधि से पीड़ित अर्थात् अल्प-दोषयुक्त समझ कर इस रोगी को संशोधन के लिये मृदु संशोधन देते हैं, उस समय इसके दोषों को वे और भी अधिक बढ़ा देते हैं और जब लघु-व्याधि से पीड़ित व्यक्ति को महादोषयुक्त, गुरु-व्याधि वाला समझकर संशोधन के लिये तीक्ष्ण संशोधन देते हैं, तब दोषों को बहुत अधिक मात्रा में बाहर निकाल कर इस रोगी के शरीर को निर्बल करते हैं। इस प्रकार से ज्ञान के एक ही भाग से सम्पूर्ण ज्ञेय वस्तु का ज्ञान करके काम करने पर ये सब स्थानों पर धोखा खाते हैं। इसके विपरीत तीनों प्रमाणों द्वारा परीक्षा करने वाले, सर्व प्रमाण-कुशल वैद्य सत्त्व आदि सब बातों की परीक्षा करके कार्य करते हैं, इसलिये चिकित्सा कार्य में वे कहीं भी धोखा नहीं खाते। इससे इनको मनोवाञ्छित प्रयोजन (आरोग्य) मिल जाता है।४। भवन्ति चात्र— सत्त्वादीनां विकल्पेन व्याधीनां रूपमातुरे । दृष्ट्वा विप्रतिपद्यन्ते बाला व्याधिबलाबले ॥ ५ ॥ ते भेषजमयोगेन कुर्वन्त्यज्ञानमोहिताः । व्याधितानां विनाशाय क्लेशाय महतेऽपि वा ॥ ६ ॥ प्राज्ञास्तु सर्वमाज्ञाय परीक्ष्यमिह सर्वथा । न स्खलन्ति प्रयोगेषु भेषजानां कदाचन ॥ ७ ॥ मूर्ख वैद्य गुरु-व्याधित पुरुष में सत्त्व आदि के उत्कर्ष और अपकर्षको न समझ कर रोग के बल और अबल (गुरु-लाघव ज्ञान) में धोखा खा जाते हैं। इस प्रकार अज्ञान के कारण रोग-ज्ञान में धोखा खाये हुए रोगियों के नाश या बड़े भारी कष्ट के लिये, अयुक्ति से (दोष-दूष्य की अपेक्षा न करके) चिकित्सा कर्म करते हैं। बुद्धिमान् वैद्य सब (सत्त्व आदि) की परीक्षा तीनों प्रमाणों द्वारा करके औषध का प्रयोग करते हैं, इसलिये वे चिकित्सा कर्म में कभी भूल नहीं करते ॥ ५-७ ॥ इति व्याधितरूपाधिकारे श्रुत्वा व्याधितरूपसंख्याप्रसंभवं व्या- धितरूपहेतुं विप्रतिपत्तौ च कारणं सापवादं संप्रतिपत्तिकारणं चान- पवादं, भगवन्तमात्रेयमग्निवेशोऽतः परं सर्वकृमीणां पुरुषसंश्रयाणां