भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ७] विमानस्थानम् ५४३ समुत्थान-स्थान-संस्थान-वर्ण-नाम-प्रभाव-चिकित्सित-विशेषान् पप्रच्छो- पसंगृह्य पादौ ॥ ८ ॥ इस प्रकार से इस व्याधित रूपाधिकार में रोगी के रूप, संख्या, परिमाण, गुरु व्याधित, लघु व्याधित, संख्या गुरु-व्याधित और लघु-व्याधित में कारण ( सत्त्वादि का उत्कर्ष और अपकर्ष ), रोग के बलाबल ज्ञान में प्रमाद ( मोह ), इस प्रमाद के कारण ( एक प्रत्यक्ष प्रमाण से ही ज्ञान करना ), सापवाद ( दोष सहित, ) सम्प्रतिपत्ति ( सम्यक् ज्ञान तीनों प्रमाणों से परीक्षा करने का ज्ञान ), और अनपवाद ( निर्दोष ), इनको सम्पूर्ण रूप में सुनकर अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय के चरणों में नमस्कार कर, सब प्रकार के कृमियों के समु- त्थान ( निदान ), स्थान संस्थान ( लक्षण ), वर्ण, नाम, प्रभाव और चि- कित्सा को पूछा ॥ ८ ॥ अथास्मै प्रोवाच भगवानात्रेयः—इह खल्वग्निवेश ! विंशतिविधाः कृमयः पूर्वमुद्दिष्टा नानाविधेन प्रविभागेनान्यत्र सहजेभ्यः, ते पुनः प्रकृतिभिर्भिद्यमानाश्चतुर्विधा भवन्ति । तद्यथा—पुरीषजाः श्लेष्मजाः शोणितजा मलजाश्चेति ॥ ९ ॥ अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा, हे अग्निवेश ! पीछे अष्टोदरीय अध्याय में सहज ( सहजन्म ) कृमियों को छोड़ कर नाना प्रकार के विभाग से बीस प्रकार के ( मलजन्य दो प्रकार के, रक्तजन्य छः प्रकार के, कफजन्य सात प्रकार के और पुरीषजन्य पांच प्रकार के ) कृमि कहे हैं। ये बीस प्रकार के कृमि प्रकृति की भिन्नता के कारण चार प्रकार के हैं। यथा—पुरीषजन्य, श्लेष्मजन्य, रक्तजन्य और मलजन्य ॥ ६ ॥ तत्र मलो बाह्यश्चाऽऽभ्यन्तरश्च । तत्र बाह्ये मले जातान्मलजांस्- चक्ष्महे । तेषां समुत्थानं—मृजावर्जनम् । स्थान—केश-श्मश्रु-लोम- पक्ष्म-वासांसि । संस्थानं-अणवस्तिलाकृतयो बहुपादाः । वर्णः कृष्णः शुक्लश्च । नामानि-यूकाः पिपीलिकाश्च । प्रभावः कण्डूजननं कोठपिड- काभिनिर्वर्तनं च । चिकित्सितं त्वेषामपकर्षणं मलोपघातो मलकराणां च भावानामनुपसेवनमिति ॥ १० ॥ इनमें मल दो प्रकार का है—( १ ) बाह्य और ( २ ) आभ्यन्तर । इनमें शरीर के बाह्यमल ( पसीना आदि से ) उत्पन्न होने वाले कृमियो को मलजन्य कृमि कहते हैं । इनकी उत्पत्ति का कारण शरीर शुद्धि का न करना है। इनका स्थान केश ( शिर के बाल ), दाढ़ी मूंछ, शरीर के लोम, आंखों की पलकों के बाल और वस्त्र हैं।

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