चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 563, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ७ ] ३२ विमानस्थानम् ५४५ अन्त्रादाः, उदारादाः, हृदयचराः, चुरवः, दर्भपुष्पाः, सौगन्धिकाः, महागुदाश्चेति । प्रभावो हृल्लासास्यसंस्रवणमरोचकाविपाको ज्वरो मूर्च्छा जम्भा क्षवथुरानाहोऽङ्गमर्दश्छर्दिः कार्श्यं पारुष्यमिति ॥ १२ ॥ कफजन्य कृमि—क्षीर-भोजन, गुड़, तिल मछली, जलचर प्राणियों के मांस पिष्टान्न और परमान्न (खीर आदि) का भोजन, कुसुम्भ का तेल, अजीर्ण में भोजन, पूति (सड़े), क्लिन्न (क्लेदकारक द्रव्यों के) संकीर्ण (हित और अहित बेमेल मिले भोजन) और विरुद्ध एवं असात्म्य भोजनों से उत्पन्न होते हैं। इनका स्थान आमाशय है। ये आमाशय से बढ़ कर यहीं से ही ऊपर या नीचे अथवा दोनों तरफ फैल जाते हैं। इनका रूप और वर्ण श्वेत तथा कुछ बड़ी मासपेशी के से, बद के आकार के, कुछ गोल आकार वाले, (वेष्टन) वाले, गिंडोये की आकृति के, श्वेत और लाल रंग की आभा वाले होते हैं। कुछ अणु (पतले), लम्बे और सूत के समान आकृति वाले, श्वेत होते हैं। इन तीनों प्रकार के कफजन्य कृमियों के नाम ये हैं। जैसे—अन्त्राद, उदराद, हृदयचर, चुरु, दर्भपुष्प, सौगन्धिक और महागुद । इन का प्रभाव—हृल्लास वमनकी रुचि होना, मुख से लार का बहना, अरुचि, अविपाक, ज्वर, मूर्च्छा, जम्भाई का आना, छींकें आना, अफरा, शरीर के अंगों का टूटना, वमन, कृशता और शरीर में रूक्षता वा कठोरता होना है ॥ १२ ॥ पुरीषजास्तुल्यसमुत्थानाः श्लेष्मजैस्तेषां स्थानं पक्वाशयः । प्रवर्धमा- नास्त्वधो विसर्पन्ति, यस्य पुनरामाशयाभिमुखाः स्युर्यदन्तरम्; तद- न्तरं तस्योद्गारनिश्वासाः पुरीषगन्धिनः स्युः; संस्थानवर्णविशेषास्तु सूक्ष्मवृत्तपरीणाहाः श्वेता दीर्घा ऊर्णाशुकसंकाशाः केचित्, केचित्पुनः स्थूलवृत्तपरीणाहाः श्यावनीलहरितपीताः । तेषां नामानि ककेरुका मकेरुका लेलिहाः सशूलकाः सौसुरादाश्चेति । प्रभावः पुरीषभेदः कार्श्यं पारुष्यं लोमहर्षोऽभिनिर्वर्तनं च, त एवास्य गुदमुखं परितुदन्तः कण्डूं चोपजनयन्तो गुदमुखं पर्यासते, त एव जातहर्षा गुदनिष्क्रमण- मतिवेलं कुर्वन्ति-इत्येष श्लेष्मजानां पुरीषजानां च कृमीणां समुत्थाना- दिविशेषः ॥ १३ ॥ पुरीषजन्य (मल से उत्पन्न) कृमियों का निदान कफजन्य कृमियों के समान है। इन कृमियों का स्थान पक्वाशय है। ये कृमि बढ़कर नीचे को ओर फैलते हैं। जिस पुरुष में ये कृमि आमाशय की ओर जाने लगते हैं, उस पुरुष के उद्गार (डकार) और श्वास में मल की गन्ध आती है। इनका रूप वर्ण—सूक्ष्म, गोल वेष्टन वाले तथा श्वेत और भेड़ के लम्बे बालो के समान