भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 564

५४६ चरकसंहिता [ अ०७ होते हैं। कुछ स्थूल, गोल वेष्टन वाले, काले, नीले, हरे या पीले रंग के होते हैं। इन के नाम—ककेरुक, मकेरुक, लेलिह, ससूलक, सौसुराद हैं। इनका प्रभाव—मल का पतला आना, शरीर में कृशता, परुषता और रोमांच होना है। ये कृमि रोगी की गुदा के मुख पर रहते हैं। ये हर्ष उत्पन्न होने पर बार बार गुदा से बाहर (मल के साथ) निकलते हैं। यह कफजन्य और पुरीष- जन्य कृमियों में उत्पत्ति आदि का भेद है ॥ १३ ॥ चिकित्सितं तु खल्वेषां समासेनोपदेक्ष्य पश्चाद्विस्तरेणोपदेक्ष्यामः । तत्र सर्वकृमीणामपकर्षणमेवाऽऽदितः कार्यं; ततः प्रकृतिविघातोऽनन्तरं निदानोक्तानां भावानामनुपसेवनमिति ॥ १४ ॥ कफ और मल से उत्पन्न कृमियों की चिकित्सा संक्षेप में कहकर फिर पीछे से विस्तार से कहेंगे। इन कृमियों का प्रथम अपकर्षण (खींचना शोधन) करना चाहिये, फिर प्रकृति-विघात (उपशम) और पीछे से निदान- रूप पदार्थों का अनुपसेवन अर्थात् त्याग करना चाहिये ॥ १४ ॥ तत्रापकर्षणं हस्तेनाभिगृह्य विमृश्योपकरणवताऽपनयनमनुपक- रणेन वा, स्थानगतानां तु कृमीणां भेषजेनापकर्षणं; न्यायतस्तु तच्चतु- र्विधम्। तद्यथा—शिरोविरेचनं वमनं विरेचनमास्थापनमित्यपक- र्षणविधिः ॥ १५ ॥ अपकर्षण विधि—उपकरण (संदंश, चिमटी आदि) से अथवा बिना उपकरण के हाथ से पकड़ कर बाहर निकालने का नाम 'अपकर्षण' है। यह कार्य बाह्य मलजन्य (पुरीषजन्य) और श्लेष्मजन्य कृमियों के स्थान से निकले होने पर ही हो सकता है और जो कृमि अपने स्थान में स्थित हों, उनको औषध द्वारा निकालना उचित है और यह औषध चार प्रकार का है। यथा—शिरोविरेचन, वमन, विरेचन और आस्थापन । यह अपकर्षण- विधि है ॥ १५ ॥ प्रकृतिविघातस्तेषां—कटु-तिक्त-कषाय-क्षारोष्णानां द्रव्याणामुपयोगो यच्चान्यदपि किंचिच्छ्लेष्मपुरीषप्रत्यनीकभूतं तत्स्यादिति प्रकृति- विघातः ॥ १६ ॥ प्रकृति-विघात—प्रकृति (कफ और पुरीष) का उपघात अर्थात् नाश या शमन करना। इस के लिये कटु, तिक्त, कषाय, क्षार और उष्ण पदार्थों का उपयोग करना चाहिये। इसके अतिरिक्त और भी जो कुछ श्लेष्मा और मल के विरुद्ध आहार-विहार हो उसका सेवन करना चाहिये। यह प्रकृति-विघात- विधि है ॥ १६ ॥