चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 569, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षोदयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा विडङ्गकषायेण त्रिफलाकषायेण वाऽष्टकृत्वो दशकृत्वो वाऽऽतपे सुपरिभावितानि भावयित्वा दृषदि पुनः सूक्ष्माणि चूर्णानि कारयित्वा नवे कलशे समा- वाप्यानुगुप्तं निधापयेत् । तेषां तु खलु चूर्णानां पाणितलं चूर्णं यावद्वा साधु मन्येत, तत् क्षौद्रेण संसृज्य कृमिकोष्ठाय लेढुं यच्छेत् ॥ २४ ॥ इसके पीछे घोड़े की शकृत (लीद) को लाकर बड़ी चटाई पर फैलाकर धूप में सुखा ले। फिर ऊखल में कूटकर शिला पर पीसकर बारीक बनाले इस चूर्ण को विडंग के कषाय से या त्रिफला-कषाय से आठ बार अथवा दस बार धूप में भावना देकर शुष्क कर ले। फिर इसको पत्थर पर पीसकर नये घड़े में रखकर, वायु आदि न जा सके इस प्रकार से मुख को ढांप कर गुप्त स्थान पर रख दे। इसमें से कर्ष परिमाण (चार माशा) अथवा रोग के अनुसार जितनी मात्रा उचित समझे उतनी मात्रा को शहद में मिलाकर कृमि रोगी को खाने के लिये दे ॥ २४ ॥ तथा भल्लातकास्थीन्याहृत्य कलशप्रमाणेन संपोथ्य स्नेहभाविते दृढ़े कलशे सूक्ष्मानेकच्छिद्रप्रध्ने शरीरमुपवेष्ट्य मृदावलिप्ते समावाप्यो- ल्पेन पिधाय भूमावाकण्ठं निखातस्य स्नेहभावितस्यैवान्यस्य दृढस्य कुम्भस्योपरि समारोप्य समन्ताद् गोमयैरुपचित्य दाहयेत्; स यदा जानीयात् साधु दग्धानि गोमयानि गलितस्नेहानि भल्लातकास्थीनीति, ततस्तं कुम्भमुद्घाटयेत् । अथ तस्माद् द्वितीयात्कुम्भात्तं स्नेहमादाय विडङ्गतण्डुलचूर्णैः स्नेहार्धमात्रैः प्रतिसंसृज्याऽऽतपे सर्वमहः स्थाप- यित्वा ततोऽस्मै मात्रां प्रयच्छेत्पानाय, तेन साधु विरिच्यते, विरिक्तस्य चाऽऽनुपूर्वी यथोक्ता ॥ २५ ॥ दूसरा प्रयोग—घड़े में जितने भिलावे के फल आ सकें, उतने फलों को कूट कर तैलादि स्नेह से चिकने, मजबूत एक घड़े में भरे। इस घड़े के निचले भाग में अनेक सूक्ष्म छिद्र बना दे तथा घड़े पर मिट्टी का लेप कर दे। इस घड़े में भिलावे भर कर ढक्कन से मुंह ढांप दे। फिर स्नेह से भावित एक दूसरे घड़े को ले कर जमीन में गले तक गाड़ दे। इस गड़े हुए घड़े के ऊपर भिलावे वाला घड़ा रख कर चारों ओर उपले रख कर जलावे। जब उपले भली प्रकार जल जावें, तब ऊपर के घड़े को पृथक् करे। जब इस दूसरे घड़े में से तेल (स्नेह) ले कर स्नेह से आधी मात्रा में विडंग-तण्डुल चूर्ण को स्नेह में मिला कर धूप में चार प्रहर तक रखे। पीछे इस स्नेह को