भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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५५२ चरकसंहिता [ अ० ७ कृमि-कोष्ठ रोगी को पीने के लिये दे । इससे भली प्रकार विरेचन होता है। विरेचन के पीछे पूर्व की भांति पेया आदि देने का क्रम है ॥२५॥ एवमेव भद्रदारु-सरलकाष्ठस्नेहानुपकल्प्य पातुं प्रयच्छेत्। अनुवा- सयेच्चैनमनुवासनकाले ॥ २६ ॥ इसी भल्लात के स्नेह-विधि से देवदारु, सरल (राल-सर्ज), वृक्षों से स्नेह बना कर रोगी को पीने के लिये देना चाहिये और अनुवासन के योग्य समय में कहे हुए स्नेहों से अनुवासन देना चाहिये ॥ २६ ॥ अथ 'आहर' इति ब्रूयात् शारदान्नावांस्तिलान्संपदुपपेतान्। तानाहृत्य सुनिष्पूय सुशुद्धान् शोधयित्वा विडङ्गकषाये सुखोष्णे निर्वापयेदाश्लेष- गमनात्, गतदोषानभिसमीक्ष्य सुप्रलूनान्प्रलुञ्च्य पुनरेव सुनिष्पूतान् सुनिष्पूय सुशुद्धान् शोधयित्वा विडङ्गकषायेण त्रिःसप्तकृत्वः सुपरिभा- वितान्भावयित्वाऽऽतपे शोषयित्वोलूखले संक्षुद्य दृषदि पुनः श्लक्ष्णपिष्टा- न्कारयित्वा द्रोण्यामभ्यवधाय विडङ्गकषायेण मुहुर्मुहुरवसिञ्चन् पाणि- मर्दमेव मर्दयेत् । तस्मिन्खलु प्रपीड्यमाने यत्तैलमुदियात्तत्पाणिभ्यां पर्यादाय शुचौ दृढे कलशे समासिच्यानुगुप्तं निधापयेत् । अन्ययोग—वैद्य रोगी से कहे कि 'आगे कहे पदार्थ लाओ'। अच्छी प्रकार पके, रस-वीर्य युक्त, शरद ऋतु में होने वाले नये तिलों को ला कर, भली प्रकार मिट्टी आदि से साफ़ करके सुखा ले । फिर सुखोष्ण, कुछ गरम बिडंग-कषाय में भिगो दे, जब तक कि छिलके में लगा मैल दूर न हो जाय तब तक भिगो कर रखे । दोष निकलने पर इन तिलों को तुष रहित करके, सुखा लेवे । फिर छाज से साफ़ करके धोले । फिर सूखने पर बिडंग कषाय में इक्कीस बार भावना दे कर धूप में सुखा लेवे । इन तिलों को ऊखल में कूट कर पत्थर की शिला पर रख बारीक पीस लेवे । अब इनको द्रोणी (थाली, कड़ाही) में रखकर विडंग कषाय को थोड़ा थोड़ा डालते हुए हाथों से खूब मले, इस प्रकार हाथों से मलने पर जो तैल निकलता है, हाथ पर लगे हुए उस तैल को ले कर पवित्र, दृढ़ घड़े में रखकर गुप्त स्थान में सुरक्षित रख देवे । इस को खाने के लिये कहे । अथ 'आहार' इति ब्रूयात्-तिल्वकोदालकयोर्द्वौ बिल्वमात्रौ पिण्डौ श्लक्ष्णपिष्टौ विडङ्गकषायेण, ततोऽर्धमात्रौ श्यामात्रिवृतोस्ततोऽर्धमात्रौ दन्तीद्रवन्त्योरतोऽर्धमात्रौ चव्यचित्रकयोरित्येतं सम्भारं विडङ्गकषा- यस्याऽऽढकमात्रेण प्रतिसंसृज्य ततस्तैलप्रस्थमावाप्य सर्वमालोड्य महति पयोगे समासिच्याग्नावधिश्रित्य महत्यासने सुखोपविष्टः सर्वतः स्नेह-